उजागर Poetry (page 2)

मरने की मुझ को आप से हैं इज़तिराबियाँ

ताबाँ अब्दुल हई

न डरे बर्क़ से दिल की है कड़ी मेरी आँख

तअशशुक़ लखनवी

थर्ड-डिवीज़न

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

ज़रा न हम पे किया ए'तिबार गुज़री है

सय्यद हामिद

मसर्रत में भी है पिन्हाँ अलम यूँ भी है और यूँ भी

सय्यद हामिद

मेरे ख़ुश-आइंद-मुस्तक़बिल का पैग़म्बर भी तू

सुलतान रशक

वो तमाशा हूँ हज़ारों मिरे आईने हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

शौक़ रातों को है दरपय कि तपाँ हो जाऊँ

सिराजुद्दीन ज़फ़र

शौक़ रातों को है दर पे कि तपाँ हो जाऊँ

सिराजुद्दीन ज़फ़र

अब इतनी अर्ज़ां नहीं बहारें वो आलम-ए-रंग-ओ-बू कहाँ है

सिराज लखनवी

क़द तिरा सर्व-ए-रवाँ था मुझे मालूम न था

सिराज औरंगाबादी

जिस कूँ तुझ ग़म सीं दिल-शिगाफ़ी है

सिराज औरंगाबादी

जानाँ पे जी निसार हुआ क्या बजा हुआ

सिराज औरंगाबादी

पहले हुआ जो करते थे हम वो नहीं रहे

शुजा ख़ावर

दिल की बिसात क्या थी जो सर्फ़-ए-फ़ुग़ाँ रहा

शोला अलीगढ़ी

दाग़ जो अब तक अयाँ हैं वो बता कैसे मिटें

शिवकुमार बिलग्रामी

न है उस को मुझ से ग़फ़लत न वो ज़िम्मेदार कम है

शिफ़ा कजगावन्वी

असर के पीछे दिल-ए-हज़ीं ने निशान छोड़ा न फिर कहीं का

शिबली नोमानी

कहूँ मैं क्या कि क्या दर्द-ए-निहाँ है

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

गुलज़ार में वो रुत भी कभी आ के रहेगी

शरीफ़ कुंजाही

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

सर भी है पा-ए-यार भी शौक़-ए-सिवा को क्या हुआ

शकील बदायुनी

बस इक निगाह-ए-करम है काफ़ी अगर उन्हें पेश-ओ-पस नहीं है

शकील बदायुनी

ग़म-ए-उल्फ़त मिरे चेहरे से अयाँ क्यूँ न हुआ

शकेब जलाली

तू जो मूसा हो तो उस का हर तरफ़ दीदार है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

बंदा अगर जहाँ में बजाए ख़ुदा नहीं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

अब की चमन में गुल का ने नाम ओ ने निशाँ है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

लम्स आहट के हवाओं के निशाँ कुछ भी नहीं

शाहिदा हसन

बोलते बोलते जब सिर्फ़ ज़बाँ रह गए हम

शाहीन अब्बास

जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा

शाह नसीर

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