बाहर Poetry (page 20)

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

हम मय-कदे से मर के भी बाहर न जाएँगे

बेदम शाह वारसी

ग़म्ज़ा-ए-मा'शूक़ मुश्ताक़ों को दिखलाती है तेग़

बयान मेरठी

रंग से पैरहन-ए-सादा हिनाई हो जाए

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

हम कहाँ आइना ले कर आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल से बाहर हैं ख़रीदार अभी

बाक़ी सिद्दीक़ी

ऐसा वार पड़ा सर का

बाक़ी सिद्दीक़ी

यूँ सितमगर नहीं होते जानाँ

बाक़ी अहमदपुरी

रोज़-ए-वहशत है मिरे शहर में वीरानी की

बाक़ी अहमदपुरी

दीवारें

बलराज कोमल

चाल अपनी अदा से चलते हैं

बकुल देव

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल

ज़फ़र

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

ज़फ़र

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल

ज़फ़र

गौरय्यों ने जश्न मनाया मेरे आँगन बारिश का

बद्र-ए-आलम ख़लिश

टपकते शो'लों की बरसात में नहाउँगा

बदनाम नज़र

है बहुत मुश्किल निकलना शहर के बाज़ार में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

किसी ख़याल की हिद्दत से जलना चाहती हूँ

अज़रा नक़वी

ये दिमाग़

अज़रा अब्बास

सेल्फ-पोर्ट्रेट

अज़रा अब्बास

एक नज़्म रोज़ आती है

अज़रा अब्बास

एक नज़्म लिखना मुश्किल है

अज़रा अब्बास

अजीब हालत है जिस्म-ओ-जाँ की हज़ार पहलू बदल रहा हूँ

अज़्म शाकरी

अजीब हालत है जिस्म-ओ-जाँ की हज़ार पहलू बदल रहा हूँ

अज़्म शाकरी

अगर दश्त-ए-तलब से दश्त-ए-इम्कानी में आ जाते

अज़्म शाकरी

कितने मौसम सरगर्दां थे मुझ से हाथ मिलाने में

अज़्म बहज़ाद

कितने मौसम सरगर्दां थे मुझ से हाथ मिलाने में

अज़्म बहज़ाद

किसी के नाम पे नन्हे दिए जलाते हुए

अज़लान शाह

हर आईना इक अक्स-ए-नौ ढूँडता है

अज़ीज़ तमन्नाई

न जाने कैसी महरूमी पस-ए-रफ़्तार चलती है

अज़ीज़ नबील

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