बाहर Poetry (page 21)

कुछ देर तो दुनिया मिरे पहलू में खड़ी थी

अज़ीज़ नबील

कुछ हिसाब ऐ सितम ईजाद तो कर

अज़ीज़ लखनवी

उम्र भर रास्ते घेरे रहे उस शख़्स का घर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

आप भी रेत का मल्बूस पहन कर देखें

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

घर से बाहर निकल कर

अज़ीज़ अन्सारी

किसी बुज़दिल की सूरत घर से ये बाहर निकलता है

अज़हर नवाज़

ख़ूबसूरत है सिर्फ़ बाहर से

अज़हर नवाज़

नींद पलकों पे यूँ रखी सी है

अज़हर नवाज़

कोई ऐसी बात है जिस के डर से बाहर रहते हैं

अज़हर नक़वी

हर एक राह में इम्कान-ए-हादिसा है अभी

अज़हर नैयर

मुझ को वहशत हुई मिरे घर से

अज़हर इक़बाल

तिरे तक़ाज़ों पे चेहरे बदल रहा हूँ मैं

अज़हर इनायती

तस्बीह-ए-कुमरी सर्व-ए-सनोबर समेट लो

अज़हर हाश्मी

दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था

अज़हर फ़राग़

इस लिए मैं ने मुहाफ़िज़ नहीं रक्खे अपने

अज़हर अदीब

मुझ को इतना तो यक़ीं है मैं हूँ

अज़हर अब्बास

शबाब आया तड़पने और तड़पाने का वक़्त आया

अाज़म जलालाबादी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए

आज़ाद गुलाटी

मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ

आज़ाद गुलाटी

हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था

आज़ाद गुलाटी

रूह ज़ख़्मी है जिस्म घायल है

आयुष चराग़

मुसव्विर का हाथ

अतहर राज़

करता मैं अब किसी से कोई इल्तिमास क्या

अतहर नादिर

अपनी बेटी के नाम

अतीया दाऊद

दिल की दहलीज़ पे दिलबर आया

अतीब एजाज़

वो सुकून-ए-जिस्म-ओ-जाँ गिर्दाब-ए-जाँ होने को है

अताउल हक़ क़ासमी

अक़्ल की सतह से कुछ और उभर जाना था

असरार-उल-हक़ मजाज़

नए पैकर नए साँचे में ढलना चाहता हूँ मैं

असलम महमूद

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