बदन Poetry (page 14)

मुसाफ़िर सितारा

शब्बीर शाहिद

ये अपने आप पे ताज़ीर कर रही हूँ मैं

शबाना यूसुफ़

हिसार-ए-ज़ात में सारा जहान होना था

शबाना यूसुफ़

है कोई दर्द मुसलसल रवाँ-दवाँ मुझ में

शबाना यूसुफ़

शब-ए-विसाल थी रौशन फ़ज़ा में बैठा था

शबाब ललित

इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी

शानुल हक़ हक़्क़ी

खोट की माला झूट जटाएँ अपने अपने ध्यान

सीमाब ज़फ़र

कौन दरवाज़ा खुला रखता बराए इंतिज़ार

सीमाब ज़फ़र

सूरज की तपती धूप ने मारा है इन दिनों

सीमा शर्मा मेरठी

इक क़यामत का घाव आँखें थीं

सीमा ग़ज़ल

सर-ब-सर बदला हुआ देखा था कल यार का रंग

सावन शुक्ला

वीरानियों के ख़ार तो फूलों की छुवन भी

सौरभ शेखर

सामान है इस दर्जा अम्बार से सर फोड़ो

सौरभ शेखर

शुऊर की तह के फाटकों पर

सत्यपाल आनंद

आमरियत का क़सीदा

सरवत ज़ेहरा

निगाह-ए-ख़ाक! ज़रा पैराहन बदलना तो

सरवत ज़ेहरा

देख लो रंग गर मिरे तिल के

सरवत मुख़तार

तलख़ीस के बदन में तफ़्सीर बोलती है

सरवर अरमान

रौशनी से तीरगी ताबीर कर दी जाएगी

सरवर अरमान

बुझी रूह की प्यास लेकिन सख़ी

सरवत हुसैन

वहीं पर मिरा सीम-तन भी तो है

सरवत हुसैन

सफ़ीना रखता हूँ दरकार इक समुंदर है

सरवत हुसैन

पत्थरों में आइना मौजूद है

सरवत हुसैन

देखा जो उस तरफ़ तो बदन पर नज़र गई

सरवत हुसैन

आईना चुपके से मंज़र वो चुरा लेता है

सरफ़राज़ नवाज़

नज़र भी आया तो ख़ुद से छुपा लिया मैं ने

सरफ़राज़ नवाज़

मुझ को होना है तो दरवेश के जैसा हो जाऊँ

सरफ़राज़ नवाज़

एक रस्ते की कहानी जो सुनी पानी से

सरफ़राज़ नवाज़

मैं तो अब शहर में हूँ और कोई रात गए

सरफ़राज़ ख़ालिद

उन बुतों से रब्त तोड़ा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

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