बिहार Poetry (page 10)

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

रो रही है जिस तरह ये शम्अ परवाने के बाद

शौक़ देहलवी मक्की

ये हसीं होंगे मेहरबाँ मिरे ब'अद

शौक़ बहराइची

रविश रविश पे चमन के बुझे बुझे मंज़र

शाैकत वास्ती

मुझे तो रंज क़बा-ए-हा-ए-तार-तार का है

शाैकत वास्ती

तलाश जिन की है वो दिन ज़रूर आएँगे

शरीफ़ कुंजाही

फ़ज़ा-ए-सेहन-ए-गुलिस्ताँ है सोगवार अभी

शरीफ़ कुंजाही

धड़कनें बंद-ए-तकल्लुफ़ से ज़रा आज़ाद कर

शरीफ़ कुंजाही

मौसम-ए-संग-ओ-रंग से रब्त-ए-शरार किस को था

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

किसी के वादा-ए-फ़र्दा में गुम है इंतिज़ार अब भी

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

ये ख़ुशी ग़म-ए-ज़माना का शिकार हो न जाए

शमीम करहानी

याद की सुब्ह ढल गई शौक़ की शाम हो गई

शमीम करहानी

वहाँ खुले भी तो क्यूँकर बिसात-ए-हिकमत-ओ-फ़न

शमीम करहानी

माना कि सई-ए-इश्क़ का अंजाम-कार क्या

शमीम करहानी

कौन है दर्द-आश्ना संग-दिली का दौर है

शमीम करहानी

गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

शमीम करहानी

चमन लहक के रह गया घटा मचल के रह गई

शमीम करहानी

चमन चमन जो ये सुब्ह-ए-बहार की ज़ौ है

शमीम करहानी

हर शय तुझी को सामने लाए तो क्या करूँ

शमीम जयपुरी

हमारे साथ जिसे मौत से हो प्यार चले

शमीम जयपुरी

आज मेरी शब-ए-फ़ुर्क़त की सहर आई है

शमीम जयपुरी

आज जीने की कुछ उम्मीद नज़र आई है

शमीम जयपुरी

जबकि दुश्मन हो राज़ दाँ अपना

शाकिर कलकत्तवी

जाते कहाँ जुनून के तूफ़ाँ में आ गए

शाकिर इनायती

शग़ुफ़्तगी-ए-दिल-ए-कारवाँ को क्या समझे

शकील बदायुनी

मिरी ज़िंदगी पे न मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं

शकील बदायुनी

ग़म-ए-हयात भी आग़ोश-ए-हुस्न-ए-यार में है

शकील बदायुनी

मुझे भूल जा

शकील बदायुनी

उन से उम्मीद-ए-रू-नुमाई है

शकील बदायुनी

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