बिहार Poetry (page 9)

शमीम ज़ुल्फ़-ए-यार आए न आए

सिकंदर अली वज्द

रंग लाया दिवाना-पन मेरा

सिकंदर अली वज्द

न देखा जामा-ए-ख़ुद-रफ़्तगी उतार के भी

सिद्दीक़ शाहिद

तंग आ गए हैं कश्मकश-ए-आशियाँ से हम

बाबू सि द्दीक़ निज़ामी

मुद्दतों में घर हमारे आज यार आ ही गया

बाबू सि द्दीक़ निज़ामी

नावक-ज़नी निगाह की ऐ जान-ए-जाँ है हेच

श्याम सुंदर लाल बर्क़

उस के आने पे भी नहीं आई

शुजा ख़ावर

बरपा तिरे विसाल का तूफ़ान हो चुका

शुजा ख़ावर

अश्क जो आँख में उबलते हैं

शुजा

न ख़ून-ए-दिल है न मय का ख़ुमार आँखों में

शोला अलीगढ़ी

वो पास आए आस बने और पलट गए

शोहरत बुख़ारी

वो पास आए आस बने और पलट गए

शोहरत बुख़ारी

याद है अब तक मुझे अहद-ए-जवानी याद है

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

रही दिल की दिल में ज़बाँ तक न पहुँची

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

हुआ जब जल्वा-आरा आप का ज़ौक़-ए-ख़ुद-आराई

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

नुमूद-ए-रंग से बेगाना-वार आई है

शिव दयाल सहाब

नज़र बहार न देखे तो बे-क़रार न हो

शिव दयाल सहाब

हंगामा है न फ़ित्ना-ए-दौराँ है आज-कल

शेरी भोपाली

नदी किनारे जो नग़्मा-सरा मलंग हुए

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

फूल तो दो दिन बहार-ए-जाँ-फ़ज़ा दिखला गए

ज़ौक़

मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते

ज़ौक़

कौन वक़्त ऐ वाए गुज़रा जी को घबराते हुए

ज़ौक़

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का

ज़ौक़

दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे

ज़ौक़

कौन दुनिया से बादा-ख़्वार उठा

शैख़ अली बख़्श बीमार

कब निगह उस की इश्वा-बार नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल-ओ-निगाह के हुस्न-ओ-क़रार का मौसम

शाज़िया अकबर

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

हज़ारों मुश्किलें हैं और लाखों ग़म लिए हैं हम

शायान क़ुरैशी

रूह को आज नाज़ है अपना वक़ार देख कर

शौक़ क़िदवाई

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