बिहार Poetry (page 8)

उठो ज़माने के आशोब का इज़ाला करें

सिराजुद्दीन ज़फ़र

मैं ने कहा कि तजज़िया-ए-जिस्म-ओ-जाँ करो

सिराजुद्दीन ज़फ़र

बग़ैर-ए-साग़र-ओ-यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

बग़ैर साग़र ओ यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

क़फ़स से दूर सही मौसम-ए-बहार तो है

सिराज लखनवी

न मोहतसिब की ख़ुशामद न मय-कदे का तवाफ़

सिराज लखनवी

इस दिल में तो ख़िज़ाँ की हवा तक नहीं लगी

सिराज लखनवी

यौम-ए-आज़ादी

सिराज लखनवी

ये जब्र-ए-ज़िंदगी न उठाएँ तो क्या करें

सिराज लखनवी

ये इंक़लाब भी ऐ दौर-ए-आसमाँ हो जाए

सिराज लखनवी

क़दम तो रख मंज़िल-ए-वफ़ा में बिसात खोई हुई मिलेगी

सिराज लखनवी

मुझे अब हवा-ए-चमन नहीं कि क़फ़स में गूना क़रार है

सिराज लखनवी

मिला-दिला सही इक ख़ुश्क हार बाक़ी है

सिराज लखनवी

मदद ऐ ख़याल-ए-माज़ी ज़रा आइना उठाना

सिराज लखनवी

ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ

सिराज लखनवी

तुझ ज़ुल्फ़ की शिकन है मानिंद-ए-दाम गोया

सिराज औरंगाबादी

तेरी भँवों की तेग़ के जो रू-ब-रू हुआ

सिराज औरंगाबादी

सुनो तो ख़ूब है टुक कान धर मेरा सुख़न प्यारे

सिराज औरंगाबादी

शर्बत-ए-वस्ल पिला जा लब-ए-शीरीं की क़सम

सिराज औरंगाबादी

मेरे जिगर के दर्द का चारा कब आएगा

सिराज औरंगाबादी

मज्लिस-ए-ऐश गर्म हो या-रब

सिराज औरंगाबादी

जिस दिन सीं मैं यार बूझता हूँ

सिराज औरंगाबादी

जब सीं देखा हूँ यार की सूरत

सिराज औरंगाबादी

जानाँ पे जी निसार हुआ क्या बजा हुआ

सिराज औरंगाबादी

जान जाता है अब तो आ जानी

सिराज औरंगाबादी

हवस की आँख सीं वो चेहरा-ए-रौशन न देखोगे

सिराज औरंगाबादी

अग़्यार छोड़ मुझ सें अगर यार होवेगा

सिराज औरंगाबादी

आलम के दोस्तों में मुरव्वत नहीं रही

सिराज औरंगाबादी

तिरे आते ही सब दुनिया जवाँ मालूम होती है

सिकंदर अली वज्द

शमीम-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार आए न आए

सिकंदर अली वज्द

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