मूर्ति Poetry (page 7)
तिरे दाँत सारे सफ़ेद हैं पए-ज़ेब पान से मल कर आ
शाह नसीर
सुब्ह-ए-गुलशन में हो गर वो गुल-ए-ख़ंदाँ पैदा
शाह नसीर
क़दम न रख मिरी चश्म-ए-पुर-आब के घर में
शाह नसीर
न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का
शाह नसीर
मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता
शाह नसीर
ख़ुदा के वास्ते चेहरे से टुक नक़ाब उठा
शाह नसीर
जो रक़ीबों ने कहा तू वही बद-ज़न समझा
शाह नसीर
हरम को शैख़ मत जा है बुत-ए-दिल-ख़्वाह सूरत में
शाह नसीर
गो सियह-बख़्त हूँ पर यार लुभा लेता है
शाह नसीर
देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया
शाह नसीर
दम ले ऐ कोहकन अब तेशा-ज़नी ख़ूब नहीं
शाह नसीर
छोड़ा न तुझे ने राम क्या ये भी न हुआ वो भी न हुआ
शाह नसीर
चश्म में कब अश्क भर लाते हैं हम
शाह नसीर
उट्ठी है जब से दिल में मिरे इश्क़ की तरंग
शाह आसिम
फिर उसी बुत से मोहब्बत चुप रहो
शादाब उल्फ़त
क़ौल उस दरोग़-गो का कोई भी सच हुआ है
शाद लखनवी
पास उस बुत के जो ग़ैर आ के कोई बैठ गया
शाद लखनवी
ना-तवाँ वो हूँ निगाहों में समा ही न सकूँ
शाद लखनवी
मैं वो बे-चारा हूँ जिस से बे-कसी मानूस है
शाद लखनवी
लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ
शाद लखनवी
क्या ये बुत बैठेंगे ख़ुदा बन कर
शाद लखनवी
क्या कहूँ ग़ुंचा-ए-गुल नीम-दहाँ है कुछ और
शाद लखनवी
ख़ुदा ही उस चुप की दाद देगा कि तुर्बतें रौंदे डालते हैं
शाद लखनवी
जों सब्ज़ा रहे उगते ही पैरों के तले हम
शाद लखनवी
जी जाऊँ जो बंद नातिक़ा हो
शाद लखनवी
जान या दिल नज़्र करना चाहिए
शाद लखनवी
हुई तो जा दिल में उस सनम की नमाज़ में सर झुका झुका कर
शाद लखनवी
हर शब ख़याल-ए-ग़ैर के मारे अलग-थलग
शाद लखनवी
गले लिपटे हैं वो बिजली के डर से
शाद लखनवी
दुनिया में क़स्र-ओ-ऐवाँ बे-फ़ाएदा बनाया
शाद लखनवी
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