मूर्ति Poetry (page 9)

चैन अब मुझ को तह-ए-दाम तो लेने देते

सैफ़ुद्दीन सैफ़

ज़िंदगानी का ये पहलू कुछ ज़रीफ़ाना भी है

साहिर सियालकोटी

वो सुब्ह कभी तो आएगी

साहिर लुधियानवी

उमीद

साहिर लुधियानवी

मिरे अहद के हसीनो

साहिर लुधियानवी

एक शाम

साहिर लुधियानवी

ब-शर्त-ए-उस्तुवारी

साहिर लुधियानवी

यूँ तो हर दीन में है साहब-ए-ईमाँ होना

साहिर देहल्वी

हौसला वज्ह-ए-तपिश-हा-ए-दिल-ओ-जाँ न हुआ

साहिर देहल्वी

दिल की तस्कीन को काफ़ी है परेशाँ होना

साहिर देहल्वी

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

साक़ी की इक निगाह के अफ़्साने बन गए

साग़र सिद्दीक़ी

कुछ हक़ीक़त तो हुआ करती थी इंसानों में

सईद अहमद अख़्तर

तबीअत रफ़्ता रफ़्ता ख़ूगर-ए-ग़म होती जाती है

सदा अम्बालवी

जब न तब सुनिए तो करता है वो इक़रार बग़ैर

राय सरब सुख दिवाना

इस हज में वो बुत भी साथ होगा

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का

रियाज़ ख़ैराबादी

उस हुस्न का शैदा हूँ उस हुस्न का दीवाना

रियाज़ ख़ैराबादी

पाया जो तुझे तो खो गए हम

रियाज़ ख़ैराबादी

पैमाने में वो ज़हर नहीं घोल रहे थे

रियाज़ ख़ैराबादी

मर कर अरे वाइज़ कोई ज़िंदा नहीं होता

रियाज़ ख़ैराबादी

मय रहे मीना रहे गर्दिश में पैमाना रहे

रियाज़ ख़ैराबादी

कोई पूछे न हम से क्या हुआ दिल

रियाज़ ख़ैराबादी

जो उन से कहो वो यक़ीं जानते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

जो हम आए तो बोतल क्यूँ अलग पीर-ए-मुग़ाँ रख दी

रियाज़ ख़ैराबादी

गुल मुरक़्क़ा' हैं तिरे चाक गरेबानों के

रियाज़ ख़ैराबादी

दर खुला सुब्ह को पौ फटते ही मय-ख़ाने का

रियाज़ ख़ैराबादी

आईना देखते ही वो दीवाना हो गया

रियाज़ ख़ैराबादी

टूटे बुत मस्जिद बनी मिस्मार बुत-ख़ाना हुआ

रिन्द लखनवी

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