मूर्ति Poetry (page 8)

दम-ब-ख़ुद हम तो डरे बैठे हैं

शाद लखनवी

ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम

शाद अज़ीमाबादी

हुई मुद्दत कि मैं ने बुत-परस्ती छोड़ दी ज़ाहिद

शबाब

आशिक़ की जान जाती है इस बाँकपन को छोड़

शबाब

खरी बातें ब-अंदाज़-ए-सुख़न कह दूँ तो क्या होगा

शाद आरफ़ी

जो उम्र तेरी तलब में गँवाए जाते हैं

सीमाब अकबराबादी

हस्ती को मिरी मस्ती-ए-पैमाना बना दे

सीमाब अकबराबादी

कहाँ नसीब ज़मुर्रद को सुर्ख़-रूई ये

सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़

बूँद अश्कों से अगर लुत्फ़-ए-रवानी माँगे

सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़

तुझ इश्क़ के मरीज़ की तदबीर शर्त है

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हिन्दू हैं बुत-परस्त मुसलमाँ ख़ुदा-परस्त

मोहम्मद रफ़ी सौदा

दिल मत टपक नज़र से कि पाया न जाएगा

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बरहमन बुत-कदे के शैख़ बैतुल्लाह के सदक़े

मोहम्मद रफ़ी सौदा

ज़ौक़-ए-सुख़न को अब तो तेरे आग लगाना अच्छा है

सरवर नेपाली

बढ़ रहे हैं शाम के मौहूम साए चल पड़ो

सरदार सलीम

ज़ाहिद मिरी समझ में तो दोनों गुनाह हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

कोई उस से नहीं कहता कि ये क्या बेवफ़ाई है

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

जिस का राहिब शैख़ हो बुत-ख़ाना ऐसा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

सितमगर तुझ से हम कब शिकवा-ए-बेदाद करते हैं

सरस्वती सरन कैफ़

साए की ख़ामोशी

सारा शगुफ़्ता

बड़ी ही अँधेरी डगर है मियाँ

सलीम शीराज़ी

पीतल का साँप

सलाम मछली शहरी

मज़दूर लड़की

सलाम मछली शहरी

न मौज-ए-बादा न ज़ुल्फ़ों न इन घटाओं ने

सलाम मछली शहरी

शैख़-जी बुत की बुराई कीजे

सख़ी लख़नवी

पूजना बुत का है ये क्या मज़मून

सख़ी लख़नवी

ये तो मालूम कि फिर आइएगा

सख़ी लख़नवी

रुख़-ए-रौशन पे सफ़ा लोट गई

सख़ी लख़नवी

मुंकिर-ए-बुत है ये जाहिल तो नहीं

सख़ी लख़नवी

हम पे जौर-ओ-सितम के क्या मअनी

सख़ी लख़नवी

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