चंद्रमा Poetry (page 13)

क्या सताते हो रहो बंदा-नवाज़

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जिस ने आदम के तईं जाँ बख़्शा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जब से तुम्हारी आँखें आलम को भाइयाँ हैं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इश्क़ ने चुटकी सी ली फिर आ के मेरी जाँ के बीच

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इश्क़ नहीं कोई नहंग है यारो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

होवे वो शोख़-चश्म अगर मुझ से चार चश्म

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हो रहा है अब्र और करता है वो जानाना रक़्स

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हस्ती की क़ैद से ऐ दिल आज़ाद होइए

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देखते सज्दे में आता है जो करता है निगाह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दहन है तंग शकर और शकर तिरा है कलाम

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आशिक़ का जहाँ में घर न देखा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

याँ मुद्दई' अपना किसे ऐ यार न देखा

शैख़ मोहम्मद रोशन जोशिश लखनवी

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए

शहरयार

एक और साल गिरह

शहरयार

उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए

शहरयार

बुनियाद-ए-जहाँ में कजी क्यूँ है

शहरयार

अहल-ए-दिल को बुला रहा हूँ

शहराम सर्मदी

नसीब-ए-चश्म में लिक्खा है गर पानी नहीं होना

शहराम सर्मदी

ख़ला सा ठहरा हुआ है ये चार-सू कैसा

शहराम सर्मदी

नास्तल्जिया

शहनाज़ नबी

इंसाफ़

शहनाज़ नबी

''जो भी आवे है वो नज़दीक ही बैठे है तिरे''

शहनवाज़ ज़ैदी

ठहरा है क़रीब-ए-जान आ कर

शाहिदा हसन

सितारा-चश्म है और मेहरबाँ है

शाहिदा हसन

सानेहा हो के रहा चश्म का मुरझा जाना

शाहिदा हसन

सलीक़ा इश्क़ में मेरा बड़े कमाल का था

शाहिदा हसन

कोई तारा न दिखा शाम की वीरानी में

शाहिदा हसन

शिकस्ता जिस्म दरीदा जबीन की जानिब

शाहिद कमाल

ख़ुद मुझ को मेरे दस्त-ए-कमाँ-गीर से मिला

शाहिद कमाल

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