चंद्रमा Poetry (page 14)

ख़ुद मुझ को मेरे दस्त-ए-कमाँ-गीर से मिला

शाहिद कमाल

आप के इज़्न-ए-मुलाक़ात से जी डरता है

शाहिद अख़्तर

अगर ये रौशनी क़ल्ब ओ नज़र से आई है

शाहीन मुफ़्ती

सियाही गिरती रहे और दिया ख़राब न हो

शाहीन अब्बास

कुछ भी न जब दिखाई दे तब देखता हूँ मैं

शाहीन अब्बास

गरमी-ए-पहलू-ए-दिलदार ने सोने न दिया

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

दयार-ए-शाम न बुर्ज-ए-सहर में रौशन हूँ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

ये चर्ख़-ए-नीलगूँ इक ख़ाना-ए-पुर-दूद है यारो

शाह नसीर

रुवाक़-ए-चशम में मत रह कि है मकान-ए-नुज़ूल

शाह नसीर

'नसीर' अब हम को क्या है क़िस्सा-ए-कौनैन से मतलब

शाह नसीर

मैं उस की चश्म का बीमार-ए-ना-तवाँ हूँ तबीब

शाह नसीर

बुर्क़ा को उलट मुझ से जो करता है वो बातें

शाह नसीर

बसान-ए-आइना हम ने तो चश्म वा कर ली

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ छुटती तिरे रुख़ पर तो दिल अपना फिरता

शाह नसीर

वाँ कमर बाँधे हैं मिज़्गाँ क़त्ल पर दोनों तरफ़

शाह नसीर

उठती घटा है किस तरह बोले वो ज़ुल्फ़ उठा कि यूँ

शाह नसीर

उस काकुल-ए-पुर-ख़म का ख़लल जाए तो अच्छा

शाह नसीर

उधर अब्र ले चश्म-ए-नम को चला

शाह नसीर

तिरे दाँत सारे सफ़ेद हैं पए-ज़ेब पान से मल कर आ

शाह नसीर

सुब्ह-ए-गुलशन में हो गर वो गुल-ए-ख़ंदाँ पैदा

शाह नसीर

शब जो रुख़-ए-पुर-ख़ाल से वो बुर्के को उतारे सोते हैं

शाह नसीर

सदा है इस आह-ओ-चश्म-ए-तर से फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ

शाह नसीर

रंग मैला न हुआ जामा-ए-उर्यानी का

शाह नसीर

क़दम न रख मिरी चश्म-ए-पुर-आब के घर में

शाह नसीर

पामाल-ए-राह-ए-इश्क़ हैं ख़िल्क़त की खा ठोकर भी हम

शाह नसीर

निकहत-ए-गुल हैं या सबा हैं हम

शाह नसीर

न ज़िक्र-ए-आश्ना ने क़िस्सा-ए-बेगाना रखते हैं

शाह नसीर

न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का

शाह नसीर

लगा जब अक्स-ए-अबरू देखने दिलदार पानी में

शाह नसीर

ख़ुदा के वास्ते चेहरे से टुक नक़ाब उठा

शाह नसीर

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