छोड़ दो Poetry (page 34)

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा

अहमद नदीम क़ासमी

जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ

अहमद नदीम क़ासमी

जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम

अहमद नदीम क़ासमी

मुसलसल याद आती है चमक चश्म-ए-ग़ज़ालाँ की

अहमद मुश्ताक़

दुनिया में सुराग़-ए-रह-ए-दुनिया नहीं मिलता

अहमद मुश्ताक़

दिलों पे ज़ख़्म लगा के हज़ार गुज़री बहार

अहमद मासूम

तुम्हारे हिज्र को काफ़ी नहीं समझता मैं

अहमद कामरान

तुम्हारे वस्ल का जिस दिन कोई इम्कान होता है

अहमद कमाल परवाज़ी

मैं रंग-ए-आसमाँ कर के सुनहरी छोड़ देता हूँ

अहमद कमाल परवाज़ी

क्या पूछते हो शहर में घर और हमारा

अहमद जावेद

हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम

अहमद हुसैन माइल

रेहान-सिद्दीक़ी की याद में

अहमद हमेश

परछाईं का सफ़र

अहमद हमेश

ऐसा भी नहीं कि

अहमद हमेश

1973 की एक नज़्म

अहमद हमेश

ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया

अहमद फ़राज़

वो वक़्त आ गया है कि साहिल को छोड़ कर

अहमद फ़राज़

सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की

अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

अहमद फ़राज़

मैं ख़ुद को भूल चुका था मगर जहाँ वाले

अहमद फ़राज़

बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'

अहमद फ़राज़

तो बेहतर है यही

अहमद फ़राज़

सरहदें

अहमद फ़राज़

बन-बास

अहमद फ़राज़

अभी हम ख़ूबसूरत हैं

अहमद फ़राज़

साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले

अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

अहमद फ़राज़

पयाम आए हैं उस यार-ए-बेवफ़ा के मुझे

अहमद फ़राज़

किसी जानिब से भी परचम न लहू का निकला

अहमद फ़राज़

ख़ुद को तिरे मेआर से घट कर नहीं देखा

अहमद फ़राज़

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