दाग Poetry (page 7)

मौत

शहरयार

वो बेवफ़ा है हमेशा ही दिल दुखाता है

शहरयार

दिल भी दाग़-ए-नक़्श-ए-कुहन से बुझा हुआ था

शहनवाज़ ज़ैदी

ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख

शाहिद ज़की

जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है

शाहिद ज़की

सियाह सफ़्हा-ए-हस्ती पे मैं उभर न सका

शाहिद कलीम

लहू का दाग़ न था ज़ख़्म का निशान न था

शाहिद कलीम

चाँद माँगा न कभी हम ने सितारे माँगे

शाहिद अख़्तर

हम रह गए हमारा ख़लल क्यूँ नहीं रहा

शाहीन अब्बास

देखना है कब ज़मीं को ख़ाली कर जाता है दिन

शाहीन अब्बास

वफ़ा का शौक़ ये किस इंतिहा में ले आया

शहबाज़ ख़्वाजा

ये दाग़ नहीं तन पर मैं देखने को तेरे

शाह नसीर

रंग मैला न हुआ जामा-ए-उर्यानी का

शाह नसीर

पामाल-ए-राह-ए-इश्क़ हैं ख़िल्क़त की खा ठोकर भी हम

शाह नसीर

न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का

शाह नसीर

क्यूँ न कहें बशर को हम आतिश-ओ-आब ओ ख़ाक-ओ-बाद

शाह नसीर

जिगर का जूँ शम्अ काश या-रब हो दाग़ रौशन मुराद हासिल

शाह नसीर

जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा

शाह नसीर

इक क़ाफ़िला है बिन तिरे हम-राह सफ़र में

शाह नसीर

क्यूँ मुश्त-ए-ख़ाक पर कोई दिल दाग़दार हो

शाह दीन हुमायूँ

दस्तियाब उस को हुआ जब से है गुल-दस्ता-ए-दाग़

शाह आसिम

वफ़ा के दाग़ को दिल से मिटा नहीं सकता

शाग़िल क़ादरी

सोज़-ए-दरूँ हमारा ज़ाहिर न हो किसी पर

शाग़िल क़ादरी

बेगाना मिले है जब मिले हैं

शफ़क़त काज़मी

कोई टूटी हुई कश्ती का तख़्ता भी अगर है ला

शफ़ीक़ जौनपुरी

सरों पे साया ग़ुबार-ए-सफ़र के जैसा है

शफ़क़ सुपुरी

आँखों से मअ'नी-ए-सुख़न-ए-मीर देखते

शफ़क़ सुपुरी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के

शाद लखनवी

ग़ैरों में हिना वो मल रहा है

शाद लखनवी

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