दीवार Poetry (page 13)

मुँह से जो मिलाइए किसी को

शऊर बलगिरामी

जाता है यार सैर को गुलज़ार की तरफ़

शऊर बलगिरामी

तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा

शुजा ख़ावर

घर में बेचैनी हो तो अगले सफ़र की सोचना

शुजा ख़ावर

सहरा में कड़ी धूप का डर होते हुए भी

शोज़ेब काशिर

एहसास की दीवार गिरा दी है चला जा

शोज़ेब काशिर

वहशत का कहीं असर नहीं है

शोहरत बुख़ारी

रस्म-ए-गिर्या भी उठा दी हम ने

शोहरत बुख़ारी

कुछ हश्र से कम गर्मी-ए-बाज़ार नहीं है

शोहरत बुख़ारी

इक उम्र फ़साने ग़म-ए-जानाँ के गढ़े हैं

शोहरत बुख़ारी

काटे हैं दिन हयात के लाचार की तरह

शोभा कुक्कल

बातें करने में तो दुनिया में सभी होश्यार थे

शोभा कुक्कल

क्या ख़त्म न होगी कभी सहरा की हुकूमत

शोएब निज़ाम

टूटे हुए ख़्वाबों के तलबगार भी आए

शोएब निज़ाम

दरों को चुनता हूँ दीवार से निकलता हूँ

शोएब निज़ाम

नाला-ए-दिल की सदा दीवार में है दर में है

शोएब अहमद मेरठी नुद्रत

तअल्लुक़ात चटख़्ते हैं टूट जाते हैं

शिफ़ा कजगावन्वी

बज़्म में ज़िक्र मिरा लब पे वो लाए तो सही

ज़ौक़

अज़ीज़ो इस को न घड़ियाल की सदा समझो

ज़ौक़

तिलिस्म

शीरीं अहमद

रीत पर जितने भी नविश्ते हैं

शीन काफ़ निज़ाम

इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को

शीन काफ़ निज़ाम

दरवाज़ा कोई घर से निकलने के लिए दे

शीन काफ़ निज़ाम

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

ख़ौफ़-ए-सहरा

शाज़ तमकनत

बे-नंग-ओ-नाम

शाज़ तमकनत

अजनबी

शाज़ तमकनत

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

न महफ़िल ऐसी होती है न ख़ल्वत ऐसी होती है

शाज़ तमकनत

मैं लौट आऊँ कहीं तू ये सोचता ही न हो

शाज़ तमकनत

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