दीवार Poetry (page 11)

कितने जुग बीत गए फिर भी न भूला जाए

सय्यद अहमद शमीम

ये अर्ज़-ए-शौक़ है आराइश-ए-बयाँ भी तो हो

सय्यद आबिद अली आबिद

सब के जल्वे नज़र से गुज़रे हैं

सय्यद आबिद अली आबिद

ये किताबों सी जो हथेली है

स्वप्निल तिवारी

दिल ज़बाँ ज़ेहन मिरे आज सँवरना चाहें

स्वप्निल तिवारी

जो नज़र आता नहीं दीवार में दर और है

सुलतान रशक

तिलिस्म-ए-कार-ए-जहाँ का असर तमाम हुआ

सुल्तान अख़्तर

तन्हाई की ख़लीज है यूँ दरमियान में

सुल्तान अख़्तर

सिलसिला मेरे सफ़र का कभी टूटा ही नहीं

सुल्तान अख़्तर

सब का चेहरा पस-ए-दीवार-ए-अना रहता है

सुल्तान अख़्तर

पस-ए-ग़ुबार-ए-तलब ख़ौफ़-ए-जुस्तुजू है बहुत

सुल्तान अख़्तर

ख़्वाब आँखों से चुने नींद को वीरान किया

सुल्तान अख़्तर

ख़ाना-बर्बाद हुए बे-दर-ओ-दीवार रहे

सुल्तान अख़्तर

ख़ाक उड़ती है ख़रीदार कहाँ खो गए हैं

सुल्तान अख़्तर

काम आती नहीं अब कोई तदबीर हमारी

सुल्तान अख़्तर

झूट रौशन है कि सच्चाई नहीं जानते हैं

सुल्तान अख़्तर

जा चुका तूफ़ान लेकिन कपकपी है

सुल्तान अख़्तर

हर इक लम्हा हमें हम से जुदा करती हुई सी

सुल्तान अख़्तर

छीन ले क़ुव्वत बीनाई ख़ुदाया मुझ से

सुल्तान अख़्तर

बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं

सुल्तान अख़्तर

बराए नाम सही दिन के हाथ पीले हैं

सुल्तान अख़्तर

अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं

सुल्तान अख़्तर

वो सर से पाँव तलक चाहतों में डूबा था

सुलेमान ख़ुमार

तुम्हें रो कर बताना चाहते हैं

सुहैल सानी

दो पाँव हैं जो हार के रुक जाते हैं

सुहैल अहमद ज़ैदी

कुछ दफ़्न है और साँस लिए जाता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

कुछ दफ़्न है और साँस लिए जाता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

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