दीवार Poetry (page 9)
फ़र्क़ कुछ तो चाहिए अग़्यार से
मीर तस्कीन देहलवी
पत्थरों पर नक़्श उभरा क्यूँ नहीं
तसव्वुर ज़ैदी
जीना अब दुश्वार है बाबा
तारिक़ राशीद दरवेश
पाँव जब हो गए पत्थर तो सदा दी उस ने
तारिक़ क़मर
एक तस्वीर जलानी है अभी
तारिक़ क़मर
कोई कब दीवार बना है मेरे सफ़र में
तारिक़ नईम
अजब नहीं दर-ओ-दीवार जैसे हो जाएँ
तारिक़ नईम
जीना क्या है पिछ्ला क़र्ज़ उतार रहा हूँ
तारिक़ नईम
हवा का हुक्म भी अब के नज़र में रक्खा जाए
तारिक़ नईम
ब-नाम-ए-इश्क़ यही एक काम करते हैं
तारिक़ नईम
ऐसी तक़्सीम की सूरत निकल आई घर में
तारिक़ नईम
ग़म की दीवार को मैं ज़ेर-ओ-ज़बर कर न सका
तारिक़ मतीन
डूबा हूँ तो किस शख़्स का चेहरा नहीं उतरा
तारिक़ जामी
छत की कड़ियाँ जाँच ले दीवार-ओ-दर को देख ले
तनवीर सिप्रा
अहबाब हो गए हैं बहुत मुझ से बद-गुमान
तनवीर सामानी
पहले मौसम के बा'द
तनवीर अंजुम
छोटी सी खिड़की है
तनवीर अंजुम
क्या ज़रूरी है कोई बे-सबब आज़ार भी हो
तनवीर अहमद अल्वी
माल-ओ-ज़र की क़द्र क्या ख़ून-ए-जिगर के सामने
तालिब हुसैन तालिब
मुझ को दिमाग़-ए-गर्मी-ए-बाज़ार है कहाँ
तालिब चकवाली
यूँ भी तो तिरी राह की दीवार नहीं हैं
तालीफ़ हैदर
तमाम शहर ही तेरी अदा से क़ाएम है
तालीफ़ हैदर
नज़ारगी-ए-शौक़ ने दीदार में खींचा
तालीफ़ हैदर
बहुत मुश्किल था मुझ को राह का हमवार कर देना
तालीफ़ हैदर
दूर तक परछाइयाँ सी हैं रह-ए-अफ़्कार पर
तख़्त सिंह
शहर के दीवार-ओ-दर पर रुत की ज़र्दी छाई थी
ताज सईद
जी में आता है कि चल कर जंगलों में जा रहें
ताज सईद
बंद दरीचों के कमरे से पूर्वा यूँ टकराई है
ताज सईद
मैं उस की मोहब्बत से इक दिन भी मुकर जाता
ताहिर अज़ीम
लहरों में भँवर निकलेंगे मेहवर न मिलेगा
तफ़ज़ील अहमद
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