दीवार Poetry (page 15)

उल्फ़त में बिगड़ कर भी इक वज़्अ निकाली है

शाकिर इनायती

इस घर में मिरे साथ बसर कर के तो देखो

शकील शम्सी

शदीद गर्मी में कैसे निकले वो फूल-चेहरा

शकील जमाली

दिलों के माबैन शक की दीवार हो रही है

शकील जमाली

अब बंद जो इस अब्र-ए-गुहर-बार को लग जाए

शकील जमाली

ज़लज़ला

शकील बदायुनी

हादसे शहर का दस्तूर बने जाते हैं

शकील आज़मी

घर के दीवार-ओ-दर पे शाम ही से

शकील आज़मी

आख़िरी खिलौने का मातम

शकील आज़मी

ज़रा से ग़म के लिए जान से गुज़र जाना

शकील आज़मी

तुझ को सोचों तो तिरे जिस्म की ख़ुशबू आए

शकील आज़मी

राज़ में रख तिरी रुस्वाई का क़िस्सा मैं हूँ

शकील आज़मी

मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल

शकील आज़मी

कहीं से चाँद कहीं से क़ुतुब-नुमा निकला

शकील आज़मी

धूप से बर-सर-ए-पैकार किया है मैं ने

शकील आज़मी

बात से बात की गहराई चली जाती है

शकील आज़मी

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा

शकेब जलाली

मुझे गिरना है तो मैं अपने ही क़दमों में गिरूँ

शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सेहन में दो-चार गिरे

शकेब जलाली

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा

शकेब जलाली

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है

शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे

शकेब जलाली

ये सितारे मुझे दीवार नहीं होने के

शाइस्ता सहर

दीवार-ए-गिर्या

शाइस्ता मुफ़्ती

चाँद-सूरज न सही एक दिया हूँ मैं भी

शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

दर-ओ-दीवार-ए-चमन आज हैं ख़ूँ से लबरेज़

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

शहर में फिरता है वो मय-ख़्वार मस्त

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मैं अपने दस्त पर शब ख़्वाब में देखा कि अख़गर था

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

किस सितमगर का गुनाहगार हूँ अल्लाह अल्लाह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देखने से तिरे जी पाता हूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

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