दीवार Poetry (page 17)

दाम-ए-उल्फ़त से छूटती ही नहीं

शहरयार

आँख की ये एक हसरत थी कि बस पूरी हुई

शहरयार

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

शहरयार

किसी से हाथ किसी से नज़र मिलाते हुए

शहनाज़ नूर

हवा के हौसले ज़ंजीर करना चाहता है

शहनाज़ नूर

इश्क़ को अपने लिए समझा असासा दिल का

शहनाज़ मुज़म्मिल

सूरज तिरी दहलीज़ में अटका हुआ निकला

शहनवाज़ ज़ैदी

दिल भी दाग़-ए-नक़्श-ए-कुहन से बुझा हुआ था

शहनवाज़ ज़ैदी

सराब-ए-शब भी है ख़्वाब-ए-शिकस्ता-पा भी है

शाहिदा हसन

कोई सर्द हवा लब-ए-बाम चली

शाहिदा हसन

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे

शाहिद ज़की

ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच

शाहिद ज़की

ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख

शाहिद ज़की

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे

शाहिद ज़की

क्या कहूँ कैसे इज़्तिरार में हूँ

शाहिद ज़की

जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है

शाहिद ज़की

बिछड़ गया था कोई ख़्वाब-ए-दिल-नशीं मुझ से

शाहिद ज़की

सीने की मिसाल आग है चाँदी सा धुआँ है

शाहिद शैदाई

ज़ेहन में लगता है जब ख़ुश-रंग लफ़्ज़ों का हुजूम

शाहिद मीर

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

सह-पहर ही से कोई शक्ल बनाती है ये शाम

शाहिद लतीफ़

लोग हैरान हैं हम क्यूँ ये किया करते हैं

शाहिद लतीफ़

दूर सहरा में जहाँ धूप शजर रखती है

शाहिद लतीफ़

सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल

शाहिद कमाल

कूचा-ए-संग-ए-मलामत के सब आसार के साथ

शाहिद कमाल

ख़ुशियाँ मत दे मुझ को दर्द-ओ-कैफ़ की दौलत दे साईं

शाहिद कमाल

हमें ख़बर भी नहीं यार खींचता है कोई

शाहिद कमाल

ब-हर्फ़-ए-सूरत इंकार तोड़ दी मैं ने

शाहिद कमाल

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