दीवार Poetry (page 19)

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

शबनम रूमानी

पी रहा है ज़िंदगी की धूप कितने प्यार से

शबनम नक़वी

नज़्म

शबनम अशाई

कहाँ फ़ुर्क़त में है दिलदार उठना बैठना चलना

शबाब

सहरा की बे-आब ज़मीं पर एक चमन तय्यार किया

शायर लखनवी

जेहल को इल्म का मेआ'र समझ लेते हैं

शायर लखनवी

ईमा-ए-ग़ज़ल करती हैं मौसम की अदाएँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

बिखर जाएगी शाम आहिस्ता बोलो

शानुल हक़ हक़्क़ी

तिरा वहशी कुछ आगे है जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ से

सेहर इश्क़ाबादी

वक़्त ने इक नज़र जो डाली है

सीमान नवेद

ज़ात की दीवार बीचों-बीच इक दर वा हुआ

सीमाब ज़फ़र

जो अपने घर को का'बा मानते हैं

सीमाब ज़फ़र

लहू से मैं ने लिखा था जो कुछ दीवार-ए-ज़िंदाँ पर

सीमाब अकबराबादी

एक मंज़र में कई बार उसे देख के देख

सीमा नक़वी

सौदा-ए-इश्क़ के तो ख़ता-वार हम नहीं

सीमा गुप्ता

सामान है इस दर्जा अम्बार से सर फोड़ो

सौरभ शेखर

कोई दिलकश सा अफ़्साना किसी दिलदार की बातें

सौरभ शेखर

एक रौज़न के अभी किरदार में हूँ मैं

सौरभ शेखर

करता हूँ तेरे ज़ुल्म से हर बार अल-ग़ियास

मोहम्मद रफ़ी सौदा

ग़ुंचे से मुस्कुरा के उसे ज़ार कर चले

मोहम्मद रफ़ी सौदा

गर तुझ में है वफ़ा तो जफ़ाकार कौन है

मोहम्मद रफ़ी सौदा

दीं शैख़ ओ बरहमन ने किया यार फ़रामोश

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बे-वज्ह नईं है आइना हर बार देखना

मोहम्मद रफ़ी सौदा

ऐ आह तिरी क़द्र असर ने तो न जानी

मोहम्मद रफ़ी सौदा

नज़र के भेद सब अहल-ए-नज़र समझते हैं

सऊद उस्मानी

वही है दश्त-ए-सफ़र रहगुज़र से आगे भी

सत्तार सय्यद

वक़्त भी मरहम नहीं है

सरवत ज़ेहरा

सदाओं का समुंदर

सरवत ज़ेहरा

तलख़ीस के बदन में तफ़्सीर बोलती है

सरवर अरमान

शब-ए-तारीक चुप थी दर-ओ-दीवार चुप थे

सरवर अरमान

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