दीवार Poetry (page 21)

ख़ाक नींद आए अगर दीदा-ए-बेदार मिले

साक़ी फ़ारुक़ी

जो तेरे दिल में है वो बात मेरे ध्यान में है

साक़ी फ़ारुक़ी

अभी नज़र में ठहर ध्यान से उतर के न जा

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़ुशबुओं का शजर नहीं देखा

संजीव आर्या

आसेब-सिफ़त ये मिरी तन्हाई अजब है

समीना राजा

आईना-दिल दाग़-ए-तमन्ना के लिए था

समद अंसारी

मय-कशी छोड़ दी तौहीन-ए-हुनर कर आया

सलमान अंसारी

धूप पीछा नहीं छोड़ेगी ये सोचा भी नहीं

सलमा शाहीन

ज़ब्त की हद से गुज़र कर ख़ार तो होना ही था

सलीम शुजाअ अंसारी

ग़ुबार-ए-फ़िक्र को तहरीर करता रहता हूँ

सलीम शुजाअ अंसारी

इक बर्फ़ सी जमी रहे दीवार-ओ-बाम पर

सालिम सलीम

सुकूत-ए-अर्ज़-ओ-समा में ख़ूब इंतिशार देखूँ

सालिम सलीम

न छीन ले कहीं तन्हाई डर सा रहता है

सालिम सलीम

इक नए शहर-ए-ख़ुश-ए-आसार की बीमारी है

सालिम सलीम

मैं रोऊँ तो दर-ओ-दीवार मुझ पर हँसने लगते हैं

सलीम साग़र

मिरे वहम-ओ-गुमाँ से भी ज़ियादा टूट जाता है

सलीम साग़र

शब के पुर-हौल मनाज़िर से बचा ले मुझ को

सलीम सिद्दीक़ी

ख़्वाहिश-ए-तख़्त न अब दिरहम-ओ-दीनार की गूँज

सलीम सिद्दीक़ी

इतनी क़ुर्बत भी नहीं ठीक है अब यार के साथ

सलीम सिद्दीक़ी

शहरयारों ने दिखाईं मुझ को तस्वीरें बहुत

सलीम शहज़ाद

क़ाइल करूँ किस बात से मैं तुझ को सितमगर

सलीम शाहिद

मिरी थकन मिरे क़स्द-ए-सफ़र से ज़ाहिर है

सलीम शाहिद

मेरे एहसास की रग रग में समाने वाले

सलीम शाहिद

मत पूछ कि इस पैकर-ए-ख़ुश-रंग में क्या है

सलीम शाहिद

मंज़र मिरी आँखों में रहे दश्त-ए-सफ़र के

सलीम शाहिद

इन दर-ओ-दीवार की आँखों से पट्टी खोल कर

सलीम शाहिद

हर्फ़-ए-बे-मतलब की मैं ने किस क़दर तफ़्सीर की

सलीम शाहिद

घर के दरवाज़े खुले हों चोर का खटका न हो

सलीम शाहिद

ज़लील-ओ-ख़्वार होती जा रही है

सलीम मुहीउद्दीन

तुम तो कहते थे कि सब क़ैदी रिहाई पा गए

सलीम कौसर

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