दीवार Poetry (page 23)

वो पल ये घड़ी

साजिदा ज़ैदी

मी-यौमिल-हिसाब

साजिदा ज़ैदी

है जुर्म मोहब्बत तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

दिल के आँगन में जो दीवार उठा ली जाए

साजिद प्रेमी

दर्द इतना भी नहीं है कि छुपा भी न सकूँ

साजिद हमीद

कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता था

साइमा असमा

उस मुसाफ़िर की नक़ाहत का ठिकाना क्या है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

उम्र गुज़री मिरी शीरीनी-ए-गुफ़्तार के साथ

सैफ़ुद्दीन सैफ़

सुब्ह से शाम के आसार नज़र आने लगे

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कितना बेकार तमन्ना का सफ़र होता है

सैफ़ुद्दीन सैफ़

बड़े ख़तरे में है हुस्न-ए-गुलिस्ताँ हम न कहते थे

सैफ़ुद्दीन सैफ़

सीने की आग आतिश-ए-महशर हो जिस तरह

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

क्यूँ जल-बुझे कहीं तो गिरफ़्तार बोलते

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

ताज-महल

साहिर लुधियानवी

मुझे सोचने दे

साहिर लुधियानवी

ये इख़्लास-ए-गराँ-माया बहुत है

साहिर होशियारपुरी

हर एक फूल के दामन में ख़ार कैसा है

साहिर होशियारपुरी

घर

साहिल अहमद

क्या परिंदे लौट कर आए नहीं

साहिल अहमद

अहबाब भी हैं ख़ूब कि तश्हीर कर गए

सहबा वहीद

तुम ने कहा था चुप रहना सो चुप ने भी क्या काम किया

सहबा अख़्तर

मुझ पे ऐसा कोई शे'र नाज़िल न हो

सहबा अख़्तर

मैं बहारों के रूप में गुम था

सहबा अख़्तर

ज़र्द सूरज

सहर अंसारी

क्या किसी लम्हा-ए-रफ़्ता ने सताया है तुझे

सहर अंसारी

फिर इस के बाद रास्ता हमवार हो गया

सग़ीर मलाल

चाक-ए-दामन को जो देखा तो मिला ईद का चाँद

साग़र सिद्दीक़ी

रोटी कपड़ा और मकान

साग़र ख़य्यामी

ये जो दीवार पे कुछ नक़्श हैं धुँदले धुँदले

साग़र आज़मी

धूप में ग़म की मिरे साथ जो आया होगा

साग़र आज़मी

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