दीवार Poetry (page 24)

कटी पहाड़ी

सईदुद्दीन

दस्ताने

सईदुद्दीन

अलग अलग इकाइयाँ

सईदुद्दीन

साँस की धार ज़रा घुसती ज़रा काटती है

सईद शरीक़

ख़ंजर से करो बात न तलवार से पूछो

सईद राही

उज़्र हवा ने क्या रक्खा है

सईद क़ैस

जब आईने दर-ओ-दीवार पर निकल आएँ

सईद नक़वी

फ़सील-ए-ज़ात में दर तो तिरी इनायत है

सईद नक़वी

ज़ात की काल कोठरी से आख़िरी नश्रिया

सईद अहमद

खुलता है यूँ हवा का दरीचा समझ लिया

सईद अहमद

ख़ुद को जब ख़ुद से किसी रोज़ रिहाई दूँगी

सादिया सफ़दर सादी

यूँ तो हर एक शख़्स ही तालिब समर का है

सादिक़ नसीम

जो लब पे न लाऊँ वही शे'रों में कहूँ मैं

सादिक़ नसीम

दिल को पैहम दर्द से दो-चार रहने दीजिए

सादिक़ इंदौरी

सीढ़ियाँ

सादिक़

अल्फ़ाज़ की विलादत

सादिक़

फिर से लहू लहू दर-ओ-दीवार देख ले

सादिक़

मिलते नहीं हैं जब हमें ग़म-ख़्वार एक दो

सदफ़ जाफ़री

सितारे सो गए तो आसमाँ कैसा लगेगा

साबिर ज़फ़र

मैं जिस के साथ 'ज़फ़र' उम्र भर उठा बैठा

साबिर ज़फ़र

इस क़दर ऊँची हुई दीवार-ए-नफ़रत हर तरफ़

साबिर अदीब

क्या पता क्या था उधर और क्या न था

साबिर अदीब

कैसी मअनी की क़बा रिश्तों को पहनाई गई

साबिर अदीब

नया शगूफ़ा इशारा-ए-यार पर खिला है

सबा नक़वी

एक मशवरा

सबा इकराम

इन पत्थरों के शहर में दिल का गुज़र कहाँ

सबा इकराम

अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े

सबा अकबराबादी

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

जुनूँ में गुम हुए होश्यार हो कर

सबा अकबराबादी

इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है

सबा अकबराबादी

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