दीवार Poetry (page 18)

नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है

शाहिद कबीर

लाए तो नक़्द-ए-जाँ सर-ए-बाज़ार क्या कहें

शाहिद इश्क़ी

हैरानी का बोझ

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

आख़िरी क़ाफ़िला

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

दिन छोटा है रात बड़ी है

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

कैसा कैसा दर पस-ए-दीवार करना पड़ गया

शाहीन अब्बास

यादों की दीवार गिराता रहता हूँ

शाहबाज़ रिज़्वी

गरमी-ए-पहलू-ए-दिलदार ने सोने न दिया

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

ज़िंदगी शब के जज़ीरों से उधर ढूँडते हैं

शहबाज़ ख़्वाजा

क़ैद-ए-इम्काँ से तमन्ना थी गमीं छूट गई

शहाब जाफ़री

हवस-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर लिए बैठे हैं

शहाब जाफ़री

सदा है इस आह-ओ-चश्म-ए-तर से फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ

शाह नसीर

लगा जब अक्स-ए-अबरू देखने दिलदार पानी में

शाह नसीर

ख़ाल-ए-मश्शाता बना काजल का चश्म-ए-यार पर

शाह नसीर

हरम को शैख़ मत जा है बुत-ए-दिल-ख़्वाह सूरत में

शाह नसीर

बे-मेहर-ओ-वफ़ा है वो दिल-आराम हमारा

शाह नसीर

क्या कहूँ कब धुआँ नहीं उठता

शाह हुसैन नहरी

सुब्हा से है न काम न ज़ुन्नार से ग़रज़

शाह आसिम

तुम्हारी याद तो लिपटी है पूरे घर के मंज़र से

सगुफ़ता यासमीन

सदियों तुम्हारी याद में शमएँ जलाएँगे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

क़ुर्बत-ए-हुस्न में भी दर्द के आसार मिले

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ने तो यही मा'रका मारा है सफ़र में

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

इन बला की आँधियों में इक शजर बाक़ी रहे

शफ़ीक़ सलीमी

अब जा कर एहसास हुआ है प्यार भी करना था

शफ़ीक़ सलीमी

मैं हम-नफ़स हूँ मुझे राज़-दाँ भी करना था

शफ़क़ सुपुरी

सजे हैं हर तरफ़ बाज़ार ऐसा क्यूँ नहीं होता

शादाब उल्फ़त

मिस्ल-ए-ख़ंजर लेसान रखते हैं

शाद लखनवी

हैं मनाज़िर सब बहम-पर्दा नज़र बाक़ी नहीं

शबनम शकील

इक बे-नाम सी खोज है दिल को जिस के असर में रहते हैं

शबनम शकील

लम्हों का पथराव है मुझ पर सदियों की यलग़ार

शबनम रूमानी

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