दीवार Poetry (page 16)

ऐ हवाओ! मुझे दामन में छुपा ले जाओ

शैदा रूमानी

ख़्वाह महसूर ही कर दें दर-ओ-दीवार मुझे

शहज़ाद क़मर

किस लिए वो शहर की दीवार से सर फोड़ता

शहज़ाद अहमद

बैठा ही रहा सुब्ह से में धूप ढले तक

शहज़ाद अहमद

आज़ाद था मिज़ाज तो क्यूँ घर बना लिया

शहज़ाद अहमद

अन-कही

शहज़ाद अहमद

यूँ ख़ाक की मानिंद न राहों पे बिखर जा

शहज़ाद अहमद

ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से

शहज़ाद अहमद

उठीं आँखें अगर आहट सुनी है

शहज़ाद अहमद

तुझ पे जाँ देने को तय्यार कोई तो होगा

शहज़ाद अहमद

तेरे घर की भी वही दीवार थी दरवाज़ा था

शहज़ाद अहमद

सूरज की किरन देख के बेज़ार हुए हो

शहज़ाद अहमद

प्यार के रंग-महल बरसों में तय्यार हुए

शहज़ाद अहमद

पुराने दोस्तों से अब मुरव्वत छोड़ दी हम ने

शहज़ाद अहमद

मुंतज़िर दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ है कि आहू आए

शहज़ाद अहमद

कोशिश है शर्त यूँही न हथियार फेंक दे

शहज़ाद अहमद

जो दिल में खटकती है कभी कह भी सकोगे

शहज़ाद अहमद

इसी बाइस ज़माना हो गया है उस को घर बैठे

शहज़ाद अहमद

इस भरे शहर में आराम मैं कैसे पाऊँ

शहज़ाद अहमद

घर जला लेता है ख़ुद अपने ही अनवार से तू

शहज़ाद अहमद

फ़स्ल-ए-गुल ख़ाक हुई जब तो सदा दी तू ने

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

लोग सर फोड़ कर भी देख चुके

शहरयार

अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी

शहरयार

रात जुदाई की रात

शहरयार

एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक

शहरयार

उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए

शहरयार

सभी को ग़म है समुंदर के ख़ुश्क होने का

शहरयार

जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा

शहरयार

जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है

शहरयार

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