दीवार Poetry (page 14)

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

हालात के कोहना दर-ओ-दीवार से निकलें

शायान क़ुरैशी

था बंद वो दर फिर भी मैं सौ बार गया था

शौक़ क़िदवाई

आँसू मिरी आँखों से टपक जाए तो क्या हो

शौक़ बहराइची

मौत का फ़रिश्ता

शौकत आबिदी

ये दस्त-ए-नाज़ में ख़त तर्जुमान किस का है

शातिर हकीमी

गुफ़्तुगू कर के परेशाँ हूँ कि लहजे में तिरे

शारिक़ कैफ़ी

अजब लहजे में करते थे दर ओ दीवार बातें

शारिक़ कैफ़ी

ख़मोशी बस ख़मोशी थी इजाज़त अब हुई है

शारिक़ कैफ़ी

देख न पाया जिस पैकर को वादों की अँगनाई में

शारिक़ जमाल

गुलज़ार में वो रुत भी कभी आ के रहेगी

शरीफ़ कुंजाही

ज़ुल्म करते हुए वो शख़्स लरज़ता ही नहीं

शारिब मौरान्वी

नग़्मगी से सुकूत बेहतर था

शरीफ़ मुनव्वर

शहर में कैसा ख़तर लगता है

शरीफ़ अहमद शरीफ़

कुछ भी हो उस से जुदाई का सबब घर जाओ

शरीफ़ अहमद शरीफ़

अपने पस-मंज़र में मंज़र बोलते

शरर फ़तेह पुरी

रात शहर और उस के बच्चे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

महफ़िल का नूर मरजा-ए-अग़्यार कौन है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

चेहरे का आफ़्ताब दिखाई न दे तो फिर

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

जब भी तुम्हारी याद की आहट मुझे मिली

शम्स फ़रीदी

ये और बात कि गमले में उग रहा हूँ मैं

शमीम क़ासमी

रौशनी तेज़ करो

शमीम करहानी

मैं ने चाहा था कि लफ़्ज़ों में छुपा लूँ ख़ुद को

शमीम हनफ़ी

तीरगी चाँद को इनआम-ए-वफ़ा देती है

शमीम हनफ़ी

हिज्र का क़िस्सा बहुत लम्बा नहीं बस रात भर है

शमीम हनफ़ी

हर नक़्श-ए-नवा लौट के जाने के लिए था

शमीम हनफ़ी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

न संग-ए-राह न सद्द-ए-क़ुयूद की सूरत

शाम रिज़वी

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