दीवार Poetry (page 37)

दीवार

फ़ारूक़ मुज़्तर

उजले माथे पे नाम लिख रक्खें

फ़ारूक़ मुज़्तर

नक़्श आख़िर आप अपना हादिसा हो जाएगा

फ़ारूक़ मुज़्तर

अपनी आँखों के हिसारों से निकल कर देखना

फ़ारूक़ मुज़्तर

मशवरा किस ने दिया था कि मसीहाई कर

फ़ारूक़ बख़्शी

सब्ज़ मौसम की रिफ़ाक़त उस का कारोबार है

फ़ारूक़ अंजुम

न-जाने कितने लहजे और कितने रंग बदलेगा

फ़ारूक़ अंजुम

मैं मो'तबर हूँ इश्क़ मिरा मो'तबर नहीं

फ़ारूक़ अंजुम

हमारे कमरे में पत्तियों की महक ने

फरीहा नक़वी

मैं शो'ला-ए-इज़हार हूँ कोताह हूँ क़द तक

फ़ारिग़ बुख़ारी

मैं कि अब तेरी ही दीवार का इक साया हूँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

इतनी पी जाए कि मिट जाए मैं और तू की तमीज़

फ़रहत शहज़ाद

हयात को तिरी दुश्वार किस तरह करता

फ़रहत शहज़ाद

जितने लोग नज़र आते हैं सब के सब बेगाने हैं

फ़रहत क़ादरी

मिट्टी की ये दीवार कहीं टूट न जाए

फ़रहत एहसास

मैं बिछड़ों को मिलाने जा रहा हूँ

फ़रहत एहसास

धूप बोली कि मैं आबाई वतन हूँ तेरा

फ़रहत एहसास

तहरीर की फ़ुर्सत

फ़रहत एहसास

ना-रसाई

फ़रहत एहसास

बैज़ा-ए-नूर

फ़रहत एहसास

तन्हाई के आब-ए-रवाँ के साहिल पर बैठा हूँ मैं

फ़रहत एहसास

साँसें ना-हमवार मिरी

फ़रहत एहसास

साहिब-ए-इश्क़ अब इतनी सी तो राहत मुझे दे

फ़रहत एहसास

सब मिरा आब-ए-रवाँ किस के इशारों पे बहा जाता है

फ़रहत एहसास

सब लज़्ज़तें विसाल की बेकार करते हो

फ़रहत एहसास

फिर वही मौसम-ए-जुदाई है

फ़रहत एहसास

नंग धड़ंग मलंग तरंग में आएगा जो वही काम करेंगे

फ़रहत एहसास

मेरी मिट्टी का नसब बे-सर-ओ-सामानी से

फ़रहत एहसास

ख़ुद से इंकार को हम-ज़ाद किया है मैं ने

फ़रहत एहसास

हम अपने आप को अपने से कम भी करते रहते हैं

फ़रहत एहसास

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