धूप Poetry (page 5)

जाने कितनी देर चलेगी साथ मिरे चमकीली धूप

यूसुफ़ तक़ी

घुटी घुटी ही सही मेरी चाह ले लेना

यूसुफ़ तक़ी

सारा बदन है ख़ून से क्यूँ तर उसे दिखा

युसूफ़ जमाल

ख़ून-ए-तमन्ना रंग लाया हो ऐसा भी हो सकता है

यूनुस ग़ाज़ी

सूरज के साथ साथ उभारे गए हैं हम

यज़दानी जालंधरी

ख़ुदा-रा आ के मिरी लो ख़बर कहाँ हो तुम

यासीन ज़मीर

ज़ख़्म मेरे दिल पे इक ऐसा लगा

यासीन अफ़ज़ाल

बारिश रुकी वबाओं का बादल भी छट गया

यासीन अफ़ज़ाल

कोई बे-नाम ख़लिश उकसाए

याक़ूब राही

हुआ धूप में भी न कम हुस्न-ए-यार

वज़ीर अली सबा लखनवी

करना पड़ेगा अपने ही साए में अब क़याम

वज़ीर आग़ा

जबीं-ए-संग पे लिक्खा मिरा फ़साना गया

वज़ीर आग़ा

बादल बरस के खुल गया रुत मेहरबाँ हुई

वज़ीर आग़ा

उस की तस्वीर क्या लगी हुई है

वसीम ताशिफ़

बाज़ औक़ात फ़राग़त में इक ऐसा लम्हा आता है

वसीम ताशिफ़

तेरी याद

वसीम बरेलवी

सभी का धूप से बचने को सर नहीं होता

वसीम बरेलवी

अपने साए को इतना समझाने दे

वसीम बरेलवी

रात के समुंदर में ग़म की नाव चलती है

वामिक़ जौनपुरी

वो सूरतें जो बड़ी शोख़ हैं सजीली हैं

वाली आसी

दिन भर ग़मों की धूप में चलना पड़ा मुझे

वाली आसी

नादान होशियार बने जिन के रूप से

वाजिद सहरी

जो नहीं किया अब तक बे-हिसाब करना है

वाजिद क़ुरैशी

अपने अंदाज़ में औरों से जुदा लगते हो

वजीह सानी

आप ही अपना मैं दुश्मन हो गया

वजद चुगताई

हुस्न की ज़बान से

वहीदुद्दीन सलीम

पचासी साल नीचे गिर गए

वहीद अहमद

एल्बम

वहीद अहमद

जब सफ़र की धूप में मुरझा के हम दो पल रुके

वहाब दानिश

ख़ाक के पुतलों में पत्थर के बदन को वास्ता

वहाब दानिश

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