धुआं Poetry (page 6)

हवा को और भी कुछ तेज़ कर गए हैं लोग

शायर लखनवी

वो कहाँ वक़्त कि मोड़ेंगे इनाँ और तरफ़

शानुल हक़ हक़्क़ी

नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे

शानुल हक़ हक़्क़ी

कूचा-हा-ए-दिल-ओ-जाँ की तीरा-शबो आस मरती नहीं

सीमाब ज़फ़र

अल्लाह दे सके तो दे ऐसी ज़बाँ मुझे

सीमाब सुल्तानपुरी

बहार-ए-गुल से अब दौर-ए-ख़िज़ाँ तक

सत्यपाल जाँबाज़

शहर-ए-दिल सुलगा तो आहों का धुआँ छाने लगा

सत्य नन्द जावा

सहर को साथ उड़ा ले गई सबा जैसे

सत्तार सय्यद

शिकोह-ए-आब में गुम थे जिहत-निशाँ मेरे

सत्तार सय्यद

नज़र भी आया तो ख़ुद से छुपा लिया मैं ने

सरफ़राज़ नवाज़

जदीद-तरीन आदमी-नामा

सरफ़राज़ शाहिद

बना देगी ज़मीं को आज शायद आसमाँ बारिश

सरदार सलीम

हिज्र की शब नाला-ए-दिल वो सदा देने लगे

साक़िब लखनवी

मौत की ख़ुशबू

साक़ी फ़ारुक़ी

दस्त-ए-शबनम पे दम-ए-शो'ला-नवाई न रखो

समद अंसारी

आहटों से दिमाग़ जलता है

समद अंसारी

तुम्हारी आग में ख़ुद को जलाया था जो इक शब

सालिम सलीम

बदन सिमटा हुआ और दश्त-ए-जाँ फैला हुआ है

सालिम सलीम

यक़ीन है कि वो मेरी ज़बाँ समझता है

सलीम शहज़ाद

है आरज़ू कि अपना सरापा दिखाई दे

सलीम शाहिद

दर्द की ख़ुश्बू से सारा घर मोअ'त्तर हो गया

सलीम शाहिद

बुझ गए शो'ले धुआँ आँखों को पानी दे गया

सलीम शाहिद

ये आग लगने से पहले की बाज़-गश्त है जो

सलीम कौसर

कभी सितारे कभी कहकशाँ बुलाता है

सलीम कौसर

तिरी तलाश में गुज़रे कई ज़माने मुझे

सलीम काशीर

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

राख

सलीम अहमद

मंज़िल-ए-बे-जहत की ख़ैर सई-ए-सफ़र है राएगाँ

सलीम अहमद

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

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