दिल Poetry (page 10)

जो दिल ने कही लब पे कहाँ आई है देखो

ज़ेहरा निगाह

जिन बातों को सुनना तक बार-ए-ख़ातिर था

ज़ेहरा निगाह

एक के घर की ख़िदमत की और एक के दिल से मोहब्बत की

ज़ेहरा निगाह

वो किताब

ज़ेहरा निगाह

रास्ते

ज़ेहरा निगाह

पुल-सिरात

ज़ेहरा निगाह

नया घर

ज़ेहरा निगाह

एक लड़की

ज़ेहरा निगाह

''अलिफ़'' और ''बे'' के नाम

ज़ेहरा निगाह

आज की बात

ज़ेहरा निगाह

यूँ कहने को पैराया-ए-इज़हार बहुत है

ज़ेहरा निगाह

ये उदासी ये फैलते साए

ज़ेहरा निगाह

ये सच है यहाँ शोर ज़ियादा नहीं होता

ज़ेहरा निगाह

रुक जा हुजूम-ए-गुल कि अभी हौसला नहीं

ज़ेहरा निगाह

रात गहरी थी फिर भी सवेरा सा था

ज़ेहरा निगाह

क़ुर्बतों से कब तलक अपने को बहलाएँगे हम

ज़ेहरा निगाह

लब पर ख़मोशियों को सजाए नज़र चुराए

ज़ेहरा निगाह

जो दिल ने कही लब पे कहाँ आई है देखो

ज़ेहरा निगाह

हमें तो आदत-ए-ज़ख़्म-ए-सफ़र है क्या कहिए

ज़ेहरा निगाह

एक के घर की ख़िदमत की और एक के दिल से मोहब्बत की

ज़ेहरा निगाह

दिल बुझने लगा आतिश-ए-रुख़्सार के होते

ज़ेहरा निगाह

देर तक रौशनी रही कल रात

ज़ेहरा निगाह

भूली-बिसरी यादों को लिपटाए हुए हूँ

ज़ेहरा निगाह

बरसों हुए तुम कहीं नहीं हो

ज़ेहरा निगाह

बैठे बैठे कैसा दिल घबरा जाता है

ज़ेहरा निगाह

सुनो

ज़ेहरा अलवी

बस एक रंग है दिल में किसी के होने से

ज़ीशान साहिल

अब तो ये शायद किसी भी काम आ सकता नहीं

ज़ीशान साहिल

ये एक मोहब्बत है

ज़ीशान साहिल

सूरा-ए-फ़ातिहा

ज़ीशान साहिल

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