दिल Poetry (page 267)

राह-ए-तलब में अहल-ए-दिल जब हद-ए-आम से बढ़े

एजाज़ वारसी

मदावा-ए-जुनूँ सैर-ए-गुलिस्ताँ से नहीं होता

एजाज़ वारसी

किसी के शिकवा-हा-ए-जौर से वाक़िफ़ ज़बाँ क्यूँ हो

एजाज़ वारसी

ख़ून-ए-नाहक़ थी फ़क़त दुनिया-ए-आब-ओ-गिल की बात

एजाज़ वारसी

कार-ए-ख़ैर इतना तो ऐ लग़्ज़िश-ए-पा हो जाता

एजाज़ वारसी

कहाँ सबात-ए-ग़म-ए-दिल कहाँ सराब-ए-सुकूँ

एजाज़ वारसी

जिस को देखो बेवफ़ा है आइनों के शहर में

एजाज़ वारसी

दिल बुझ गया तो गर्मी-ए-बाज़ार भी नहीं

एजाज़ वारसी

और ज़िक्र क्या कीजे अपने दिल की हालत का

एजाज़ सिद्दीक़ी

ज़र्रों का मेहर-ओ-माह से याराना चाहिए

एजाज़ सिद्दीक़ी

नूर की किरन उस से ख़ुद निकलती रहती है

एजाज़ सिद्दीक़ी

मिल सकेगी अब भी दाद-ए-आबला-पाई तो क्या

एजाज़ सिद्दीक़ी

दुनिया सबब-ए-शोरिश-ए-ग़म पूछ रही है

एजाज़ सिद्दीक़ी

शहर-ए-बीना के लोग

एजाज़ रिज़वी

उसे ये हक़ है कि वो मुझ से इख़्तिलाफ़ करे

एजाज़ रहमानी

साए में आबलों की जलन और बढ़ गई

एजाज़ रहमानी

ख़ुश्क दरिया पड़ा है ख़्वाहिश का

एजाज़ रहमानी

हँसी लबों पे सजाए उदास रहता है

एजाज़ रहमानी

था वो जंगल कि नगर याद नहीं

एजाज़ उबैद

तेरे दामन की थी या मस्त हुआ किस की थी

एजाज़ उबैद

कोई हो चेहरा शनासा दिखाई देता है

एजाज़ उबैद

किस से मिलने जाओ अब किस से मुलाक़ातें करो

एजाज़ उबैद

जो जा चुके हैं ग़ालिबन उतरें कभी ज़ीना तिरा

एजाज़ उबैद

गले लग कर मिरे वो जाने हँसता था कि रोता था

एजाज़ उबैद

दूसरों की आँख ले कर भी पशेमानी हुई

एजाज़ उबैद

अभी तमाम आइनों में ज़र्रा ज़र्रा आब है

एजाज़ उबैद

नतीजा एक सा निकला दिमाग़ और दिल का

एजाज़ गुल

मश्क़-ए-सुख़न में दिल भी हमेशा से है शरीक

एजाज़ गुल

चाहा था मफ़र दिल ने मगर ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर

एजाज़ गुल

निशान-ए-ज़िंदगी

एजाज़ गुल

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