दिल Poetry (page 314)

मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया

असलम महमूद

जल रहा हूँ तो अजब रंग ओ समाँ है मेरा

असलम महमूद

हर रंग-ए-तरब मौसम ओ मंज़र से निकाला

असलम महमूद

दश्त मरऊब है कितना मिरी वीरानी से

असलम महमूद

बुझ गए मंज़र उफ़ुक़ पर हर निशाँ मद्धम हुआ

असलम महमूद

अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे

असलम महमूद

वही ख़्वाबीदा ख़ामोशी वही तारीक तन्हाई

असलम कोलसरी

नज़र को वक़्फ़-ए-हैरत कर दिया है

असलम कोलसरी

दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं

असलम कोलसरी

रफ़ीक़ दोस्त मुहिब मुझ को शाक़ सब ही थे

असलम हनीफ़

लुटी बहार का सूखा गुलाब रहने दो

असलम हबीब

कोई गुलाब यहाँ पर खिला के देखते हैं

असलम हबीब

सारे दिल एक से नहीं होते

असलम फ़र्रुख़ी

ज़द पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा

असलम फ़र्रुख़ी

हंगामा-ए-हस्ती से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

असलम फ़र्रुख़ी

आग सी लग रही है सीने में

असलम फ़र्रुख़ी

उन्हें ये फ़िक्र कि दिल को कहाँ छुपा रक्खें

असलम इमादी

कोई इशारा कोई इस्तिआ'रा क्यूँकर हो

असलम इमादी

ख़ुद अपनी चाल से ना-आश्ना रहे है कोई

असलम इमादी

ख़ून उतर आया दिल के छालों में

असलम बदर

दीवारों को दिल से बाहर रखने वाले

असलम बदर

यादों का लम्स ज़ेहन को छू कर गुज़र गया

असलम आज़ाद

वक़्त का कुछ रुका सा धारा है

असलम आज़ाद

उड़ते लम्हों के भँवर में कोई फँसता ही नहीं

असलम आज़ाद

किश्त-ए-दिल वीराँ सही तुख़्म-ए-हवस बोया नहीं

असलम आज़ाद

जगमगाती ख़्वाहिशों का नूर फैला रात भर

असलम आज़ाद

हर सू है तारीकी छाई तुम भी चुप और हम भी चुप

असलम आज़ाद

हमारी याद उन्हें आ गई तो क्या होगा

असलम आज़ाद

किसे कहें कि रिफ़ाक़त का दाग़ है दिल पर

असलम अंसारी

मय-शिकस्ता-दिली ऐ हरीफ़-ए-ज़ौक़-ए-नुमू

असलम अंसारी

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