दिल Poetry (page 313)

हुस्न को बे-हिजाब होना था

असरार-उल-हक़ मजाज़

धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी

असरार-उल-हक़ मजाज़

बर्बाद-ए-तमन्ना पे इताब और ज़ियादा

असरार-उल-हक़ मजाज़

आसमाँ तक जो नाला पहुँचा है

असरार-उल-हक़ मजाज़

ठहरे तो कहाँ ठहरे आख़िर मिरी बीनाई

असरारुल हक़ असरार

सीना-ए-संग में ढूँढता है गुदाज़

असरारुल हक़ असरार

कुछ तो मायूस दिल तेरे बस में भी है

असरारुल हक़ असरार

जानते थे ग़म तिरा दरिया भी था गहरा भी था

असरारुल हक़ असरार

ऐसी नई कुछ बात न होगी

असरारुल हक़ असरार

बरहनगी का मुदावा कोई लिबास न था

असरार ज़ैदी

शैतान का फ़रमान

असरार जामई

शायर-ए-आज़म

असरार जामई

लीडर की दुआ

असरार जामई

फ़न अस्ल में पिन्हाँ है दिल-ए-ज़ार के अंदर

असरार अकबराबादी

वस्ल की जो ख़्वाहिश है

असरा रिज़वी

परदेसी का ख़त

असरा रिज़वी

ज़िंदगी उलझी है बिखरे हुए गेसू की तरह

असरा रिज़वी

ये आग मोहब्बत की बुझाए न बुझे है

असरा रिज़वी

वो शख़्स फिर कहानी का उन्वान बन गया

असरा रिज़वी

फिर कोई ताज़ा-सितम वो सितम-ईजाद करे

असरा रिज़वी

मैं तिरे शहर में फिरती रही मारी मारी

असरा रिज़वी

दर्द की जोत मिरे दिल में जगाने वाले

असरा रिज़वी

बे-सबब ख़ौफ़ से दिल मेरा लरज़ता क्यूँ है

असरा रिज़वी

ऐसा ये दर्द है कि भुलाया न जाएगा

असरा रिज़वी

अदावतों का ये उस को सिला दिया हम ने

असरा रिज़वी

आग जो दिल में लगी है वो बुझा दी जाए

असरा रिज़वी

मुसलसल धूप से पाला पड़ा है

असलम राशिद

मिरे क़दमों में दुनिया के ख़ज़ाने हैं उठा लूँ क्या

असलम राशिद

हम दिल से रहे तेज़ हवाओं के मुख़ालिफ़

असलम महमूद

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