दिल Poetry (page 344)

मैं तिरी दस्तरस से बहुत दूर था

अमीन राहत चुग़ताई

किसी मकाँ के दरीचे को वा तो होना था

अमीन राहत चुग़ताई

जो मय-कदे से भी दामन बचा बचा के चले

अमीन राहत चुग़ताई

जरस-ए-मय ने पुकारा है उठो और सुनो

अमीन राहत चुग़ताई

हो सके तो दिल-ए-सद-चाक दिखाया जाए

अमीन राहत चुग़ताई

आज वो फूल बना हुस्न-ए-दिल-आरा देखा

अमीन राहत चुग़ताई

यूँ दिल है सर-ब-सज्दा किसी के हुज़ूर में

अमीन हज़ीं

यूँ दिल है सर-ब-सज्दा किसी के हुज़ूर में

अमीन हज़ीं

लाले पड़े हैं जान के जीने का एहतिमाम कर

अमीन हज़ीं

अफ़्साना-ए-हयात को दोहरा रहा हूँ मैं

अमीन हज़ीं

उस ने जो ग़म किए हवाले थे

अमीन अडीराई

रख दिया मैं ने दर-ए-हुस्न पे हारा हुआ इश्क़

अमीन अडीराई

आईना देख कर न तो शीशे को देख कर

अम्बर वसीम इलाहाबादी

इस से पहले कि कुछ बोला जाए

अम्बर जोशी

रेत है सूरज है वुसअत है तन्हाई

अम्बरीन सलाहुद्दीन

वहशत

अम्बरीन सलाहुद्दीन

खिड़की

अम्बरीन सलाहुद्दीन

जंगल

अम्बरीन सलाहुद्दीन

एक कहानी

अम्बरीन सलाहुद्दीन

उस के ध्यान की दिल में प्यास जगा ली जाए

अम्बरीन सलाहुद्दीन

जब मिरे शहर की हर शाम ने देखा उस को

अम्बरीन सलाहुद्दीन

बहुत बे-ज़ार होती जा रही हूँ

अम्बरीन सलाहुद्दीन

ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे

अंबरीन हसीब अंबर

ये शो'ले आज़माना जानते हैं

अंबरीन हसीब अंबर

ये शो'ले आज़माना जानते हैं

अंबरीन हसीब अंबर

तुम्हारा जो सहारा हो गया है

अंबरीन हसीब अंबर

शब थी बे-ख़्वाब इक आरज़ू देर तक

अंबरीन हसीब अंबर

मिला भी ज़ीस्त में क्या रन्ज-ए-रह-गुज़ार से कम

अंबरीन हसीब अंबर

ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया

अंबरीन हसीब अंबर

जब से ज़िंदगी हुआ दिल गर्दिश-ए-तक़दीर का

अंबरीन हसीब अंबर

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