दिल Poetry (page 345)

इक गली से ख़ुश्बू की रस्म-ओ-राह काफ़ी है

अंबरीन हसीब अंबर

बहते हुए अश्कों की रवानी नहीं लिक्खी

अंबरीन हसीब अंबर

साएबाँ क्या अब्र का टुकड़ा है क्या

अम्बर शमीम

रंग काला है न है पैकर सियाह

अम्बर शमीम

जहाँ में हर बशर मजबूर हो ऐसा नहीं होता

अम्बर खरबंदा

हर इक रिश्ता बिखरा बिखरा क्यूँ लगता है

अम्बर खरबंदा

सूखी टहनी पर हरियल

अम्बर बहराईची

शब ख़्वाब के जज़ीरों में हँस कर गुज़र गई

अम्बर बहराईची

मिरे चेहरे पे जो आँसू गिरा था

अम्बर बहराईची

गीली मिट्टी हाथ में ले कर बैठा हूँ

अम्बर बहराईची

अब क़बीले की रिवायत है बिखरने वाली

अम्बर बहराईची

जब कोई रास्ता नहीं होता

अमर सिंह फ़िगार

ज़मज़मा किस की ज़बाँ पर ब-दिल-ए-शाद आया

अमानत लखनवी

उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज

अमानत लखनवी

सुब्ह-ए-विसाल-ए-ज़ीस्त का नक़्शा बदल गया

अमानत लखनवी

रूह को राह-ए-अदम में मिरा तन याद आया

अमानत लखनवी

रवाँ दवाँ नहीं याँ अश्क चश्म-ए-तर की तरह

अमानत लखनवी

लुत्फ़ अब ज़ीस्त का ऐ गर्दिश-ए-अय्याम नहीं

अमानत लखनवी

ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ सदा

अमानत लखनवी

बानी-ए-जौर-ओ-जफ़ा हैं सितम-ईजाद हैं सब

अमानत लखनवी

आग़ोश में जो जल्वागर इक नाज़नीं हुआ

अमानत लखनवी

सबा की बात सुनें फूल से कलाम करें

अल्ताफ़ परवाज़

लम्हात-ए-आज़ादी

अल्ताफ़ मशहदी

कौन उतरा नज़र के ज़ीने से

अल्ताफ़ मशहदी

रोना है ये कि आप भी हँसते थे वर्ना याँ

अल्ताफ़ हुसैन हाली

क़लक़ और दिल में सिवा हो गया

अल्ताफ़ हुसैन हाली

कुछ हँसी खेल सँभलना ग़म-ए-हिज्राँ में नहीं

अल्ताफ़ हुसैन हाली

इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद

अल्ताफ़ हुसैन हाली

इक दर्द हो बस आठ पहर दिल में कि जिस को

अल्ताफ़ हुसैन हाली

दिखाना पड़ेगा मुझे ज़ख़्म-ए-दिल

अल्ताफ़ हुसैन हाली

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