दिल Poetry (page 368)

शाम आई है लिए हाथ में यादों के चराग़

अजय सहाब

लगा के धड़कन में आग मेरी ब-रंग-ए-रक़्स-ए-शरर गया वो

अजय सहाब

हम भी गुज़र गए यहाँ कुछ पल गुज़ार के

अजय सहाब

बिखरा हूँ जब मैं ख़ुद यहाँ कोई मुझे गिराए क्यूँ

अजय सहाब

अश्कों से कब मिटे हैं दामन के दाग़ यारो

अजय सहाब

ये जो फूलों से भरा शहर हुआ करता था

ऐतबार साजिद

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो

ऐतबार साजिद

रिहा कर दे क़फ़स की क़ैद से घायल परिंदे को

ऐतबार साजिद

फिर वही लम्बी दो-पहरें हैं फिर वही दिल की हालत है

ऐतबार साजिद

भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें

ऐतबार साजिद

ये ठीक है कि बहुत वहशतें भी ठीक नहीं

ऐतबार साजिद

ये क्या हालत बना रक्खी है ये आसार कैसे हैं

ऐतबार साजिद

ये हसीं लोग हैं तू इन की मुरव्वत पे न जा

ऐतबार साजिद

तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मिरे दिल से बोझ उतार दो

ऐतबार साजिद

तिलिस्म-ज़ार-ए-शब-ए-माह में गुज़र जाए

ऐतबार साजिद

फिर वही लम्बी दो-पहरें हैं फिर वही दिल की हालत है

ऐतबार साजिद

न गुमान मौत का है न ख़याल ज़िंदगी का

ऐतबार साजिद

मुझ से मुख़्लिस था न वाक़िफ़ मिरे जज़्बात से था

ऐतबार साजिद

मुझे वो कुंज-ए-तन्हाई से आख़िर कब निकालेगा

ऐतबार साजिद

मुझे ऐसा लुत्फ़ अता किया कि जो हिज्र था न विसाल था

ऐतबार साजिद

मैं तकिए पर सितारे बो हा हूँ

ऐतबार साजिद

किसी ने दिल के ताक़ पर जला के रख दिया हमें

ऐतबार साजिद

कहा तख़्लीक़-ए-फ़न बोले बहुत दुश्वार तो होगी

ऐतबार साजिद

कहा दिन को भी ये घर किस लिए वीरान रहता है

ऐतबार साजिद

कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है

ऐतबार साजिद

जो ख़याल थे न क़यास थे वही लोग मुझ से बिछड़ गए

ऐतबार साजिद

जाने किस चाह के किस प्यार के गुन गाते हो

ऐतबार साजिद

ढूँडते क्या हो इन आँखों में कहानी मेरी

ऐतबार साजिद

धड़कन धड़कन यादों की बारात अकेला कमरा

ऐतबार साजिद

भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें

ऐतबार साजिद

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