दिल Poetry (page 369)

बहुत सजाए थे आँखों में ख़्वाब मैं ने भी

ऐतबार साजिद

आँखों से अयाँ ज़ख़्म की गहराई तो अब है

ऐतबार साजिद

आने वाली थी ख़िज़ाँ मैदान ख़ाली कर दिया

ऐतबार साजिद

सीने में इक खटक सी है और बस

ऐश देहलवी

तू ही इंसाफ़ से कह जिस का ख़फ़ा यार रहे

ऐश देहलवी

शोर अब आलम में है उस शोबदा-पर्दाज़ का

ऐश देहलवी

फूल अल्लाह ने बनाए हैं महकने के लिए

ऐश देहलवी

फिरा किसी का इलाही किसी से यार न हो

ऐश देहलवी

न छोड़ी ग़म ने मिरे इक जिगर में ख़ून की बूँद

ऐश देहलवी

मेरा शिकवा तिरी महफ़िल में अदू करते हैं

ऐश देहलवी

मैं बुरा ही सही भला न सही

ऐश देहलवी

कुछ कम नहीं हैं शम्अ से दिल की लगन में हम

ऐश देहलवी

किसी की नेक हो या बद जहाँ में ख़ू नहीं छुपती

ऐश देहलवी

जुरअत ऐ दिल मय ओ मीना है वो ख़ुद-काम भी है

ऐश देहलवी

जो होता आह तिरी आह-ए-बे-असर में असर

ऐश देहलवी

जिस दिल में तिरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं होता

ऐश देहलवी

दोस्त जब दिल सा आश्ना ही नहीं

ऐश देहलवी

बातें न किस ने हम को कहीं तेरे वास्ते

ऐश देहलवी

आशिक़ों को ऐ फ़लक देवेगा तू आज़ार क्या

ऐश देहलवी

मैं हँस रहा था गरचे मिरे दिल में दर्द था

ऐश बर्नी

हर इक शय पर बहार-ए-ज़िंदगी महसूस करता हूँ

ऐश बर्नी

ज़ेहन पर जब दर्द ख़ामोशी की चादर तानता है

ऐनुद्दीन आज़िम

वहशत में दिल कितना कुशादा करना पड़ता है

ऐनुद्दीन आज़िम

तही-दामन बरहना-पा रवाना हो गया हूँ

ऐनुद्दीन आज़िम

सताइश न कीजिए तबर्रा सही

ऐनुद्दीन आज़िम

पाँव फँसे में हाथ छुड़ाने आया था

ऐनुद्दीन आज़िम

मुझी में जीता है सूरज तमाम होने तक

ऐनुद्दीन आज़िम

मेरे हमराह सितारे कभी जुगनू निकले

ऐनुद्दीन आज़िम

मैं ने जब हद से गुज़रने का इरादा कर लिया

ऐनुद्दीन आज़िम

कारोबारी शहरों में ज़ेहन-ओ-दिल मशीनें हैं जिस्म कारख़ाना है

ऐनुद्दीन आज़िम

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