दिल Poetry (page 366)

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं

अकबर इलाहाबादी

दिल-ए-मायूस में वो शोरिशें बरपा नहीं होतीं

अकबर इलाहाबादी

दिल हो ख़राब दीन पे जो कुछ असर पड़े

अकबर इलाहाबादी

दश्त-ए-ग़ुर्बत है अलालत भी है तन्हाई भी

अकबर इलाहाबादी

दर्द तो मौजूद है दिल में दवा हो या न हो

अकबर इलाहाबादी

चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं

अकबर इलाहाबादी

बे-तकल्लुफ़ बोसा-ए-ज़ुल्फ़-ए-चलीपा लीजिए

अकबर इलाहाबादी

अपने पहलू से वो ग़ैरों को उठा ही न सके

अकबर इलाहाबादी

आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते

अकबर इलाहाबादी

आज आराइ-ए-शगेसू-ए-दोता होती है

अकबर इलाहाबादी

आह जो दिल से निकाली जाएगी

अकबर इलाहाबादी

वही गुमाँ है जो उस मेहरबाँ से पहले था

अकबर अली खान अर्शी जादह

तुम्हारे दिल की तरह ये ज़मीन तंग नहीं

अकबर अली खान अर्शी जादह

तेरा ख़याल जाँ के बराबर लगा मुझे

अकबर अली खान अर्शी जादह

सिखा सकी न जो आदाब-ए-मय वो ख़ू क्या थी

अकबर अली खान अर्शी जादह

मिरे ख़्वाबों में ख़यालों में मिरे पास रहो

अकबर अली खान अर्शी जादह

ठहर गया है दिल का जाना

अजमल सिराज

रह गया दिल में इक दर्द सा

अजमल सिराज

मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है

अजमल सिराज

ग़म सभी दिल से रुख़्सत हुए

अजमल सिराज

तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँगा मैं

अजमल सिराज

नज़र आ रहे हैं जो तन्हा से हम

अजमल सिराज

मैं ने ऐ दिल तुझे सीने से लगाया हुआ है

अजमल सिराज

किसी की क़ैद से आज़ाद हो के रह गए हैं

अजमल सिराज

किसी के हिज्र में जीना मुहाल हो गया है

अजमल सिराज

जो अश्क बरसा रहे हैं साहिब

अजमल सिराज

गुज़र गई है अभी साअत-ए-गुज़िश्ता भी

अजमल सिराज

दुश्वार है इस अंजुमन-आरा को समझना

अजमल सिराज

और तो ख़ैर क्या रह गया

अजमल सिराज

ज़िंदगी रोज़ बनाती है बहाने क्या क्या

अजमल सिद्दीक़ी

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