दिन Poetry (page 28)

किस किस के आँसू पूछोगे और किस किस को बहलाओगे

शाहिद इश्क़ी

एक तुम्हारे प्यार की ख़ातिर जग के दुख अपनाए थे

शाहिद इश्क़ी

तुझे इस गाँव से जाना है इक दिन

शाहिद ग़ाज़ी

सुना है तेरी ज़माने पे हुक्मरानी है

शाहिद ग़ाज़ी

बाज़ार

शाहिद अख़्तर

चाँद माँगा न कभी हम ने सितारे माँगे

शाहिद अख़्तर

मौत भी रहम के क़ाबिल है

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

मौसम की विरासत

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

यूँ उलझ कर रह गई है तार-ए-पैराहन में रात

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

क़ुबूल है ग़म-ए-दुनिया तिरे हवाले से

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

नक़्श करता रम-ओ-रफ़्तार इनाँ-गीर को मैं

शाहीन अब्बास

मिरे बनने से क्या क्या बन रहा था

शाहीन अब्बास

मैं हुआ तेरा माजरा तू मिरा माजरा हुआ

शाहीन अब्बास

देखना है कब ज़मीं को ख़ाली कर जाता है दिन

शाहीन अब्बास

बनते बनते अपने पेच-ओ-ख़म बने

शाहीन अब्बास

अब ऐसे चाक पर कूज़ा-गरी होती नहीं थी

शाहीन अब्बास

पराए शहर में ख़ुशबू तलाश लेते हैं

शाहबाज़ रिज़्वी

कब गवारा है मुझे और कहीं पर चमके

शहबाज़ ख़्वाजा

जब भी कश्ती के मुक़ाबिल भँवर आता है कोई

शहाब सफ़दर

सूरज का शहर

शहाब जाफ़री

रुत्बा-ए-दर्द को जब अपना हुनर पहुँचेगा

शहाब जाफ़री

मैं ही मैं बिखरा हुआ हूँ राह-ता-मंज़िल तमाम

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

ये निगल जाएगी इक दिन तिरी चौड़ाई चर्ख़

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ छुटती तिरे रुख़ पर तो दिल अपना फिरता

शाह नसीर

टाँकों से ज़ख़्म-ए-पहलू लगता है कंखजूरा

शाह नसीर

शमीम-ए-ज़ुल्फ़-ए-मुअम्बर जो रू-ए-यार से लूँ

शाह नसीर

न दिखाइयो हिज्र का दर्द-ओ-अलम तुझे देता हूँ चर्ख़-ए-ख़ुदा की क़सम

शाह नसीर

मेरी तुर्बत पर चढ़ाने ढूँडता है किस के फूल

शाह नसीर

जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा

शाह नसीर

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