दिन Poetry (page 27)

गर्द को कुदूरतों की धो न पाए हम

शहरयार

फ़ज़ा-ए-मय-कदा बे-रंग लग रही है मुझे

शहरयार

बुनियाद-ए-जहाँ में कजी क्यूँ है

शहरयार

बहते दरियाओं में पानी की कमी देखना है

शहरयार

अक्स को क़ैद कि परछाईं को ज़ंजीर करें

शहरयार

आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ

शहरयार

मैं वापस आऊँगा

शहराम सर्मदी

लौह-ए-अय्याम

शहराम सर्मदी

ख़ुदा से

शहराम सर्मदी

याद की बस्ती का यूँ तो हर मकाँ ख़ाली हुआ

शहराम सर्मदी

मैं नहीं रोता हूँ अब ये आँख रोती है मुझे

शहराम सर्मदी

ख़ला सा ठहरा हुआ है ये चार-सू कैसा

शहराम सर्मदी

बस सलीक़े से ज़रा बर्बाद होना है तुम्हें

शहराम सर्मदी

बदल जाएगा सब कुछ ये तमाशा भी नहीं होगा

शहराम सर्मदी

ताक़-ए-जाँ में तेरे हिज्र के रोग संभाल दिए

शहनाज़ नूर

मान-सरोवर

शहनाज़ नबी

हुसैन! तोमी कोथाए

शहनाज़ नबी

हर किसी ख़्वाब के चेहरे पे लिखूँ नाम तिरा

शहनवाज़ ज़ैदी

चराग़-ए-शाम ही तन्हा नहीं है

शाहिदा हसन

ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख

शाहिद ज़की

क्या कहूँ कैसे इज़्तिरार में हूँ

शाहिद ज़की

मौज आए कोई हल्क़ा-ए-गिर्दाब की सूरत

शाहिद शैदाई

तुझ को देखा नहीं महसूस किया है मैं ने

शाहिद मीर

ऐ ख़ुदा रेत के सहरा को समुंदर कर दे

शाहिद मीर

ज़मीं तश्कील दे लेते फ़लक ता'मीर कर लेते

शाहिद लतीफ़

दश्त-ए-वहशत को फिर आबाद करूँगा इक दिन

शाहिद कमाल

आज फिर रू-ब-रू करोगे तुम

शाहिद कमाल

पुकारती है जो तुझ को तिरी सदा ही न हो

शाहिद कबीर

कैसे तोड़ी गई ये हद्द-ए-अदब पूछते हैं

शाहिद जमाल

वो हर्फ़-ए-शौक़ हूँ जिस का कोई सियाक़ न हो

शाहिद इश्क़ी

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