दिन Poetry (page 26)

आरज़ू की बे-हिसी का गर यही आलम रहा

शहज़ाद अहमद

जीने मरने के दरमियान एक साअत

शहज़ाद अहमद

ज़मीं अपने लहू से आश्ना होने ही वाली है

शहज़ाद अहमद

वो जा चुका है तो क्यूँ बे-क़रार इतने हो

शहज़ाद अहमद

वैसे तो इक दूसरे की सब सुनते हैं

शहज़ाद अहमद

उठीं आँखें अगर आहट सुनी है

शहज़ाद अहमद

उम्र जितनी भी कटी उस के भरोसे पे कटी

शहज़ाद अहमद

तिरी तलाश तो क्या तेरी आस भी न रहे

शहज़ाद अहमद

मैं अकेला हूँ यहाँ मेरे सिवा कोई नहीं

शहज़ाद अहमद

लगे थे ग़म तुझे किस उम्र में ज़माने के

शहज़ाद अहमद

कितनी बे-नूर थी दिन भर नज़र-ए-परवाना

शहज़ाद अहमद

कमरों में छुपने के दिन हैं और न बरहना रातें हैं

शहज़ाद अहमद

कैसे गुज़र सकेंगे ज़माने बहार के

शहज़ाद अहमद

जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुस्वाई

शहज़ाद अहमद

इस दौर-ए-बे-दिली में कोई बात कैसे हो

शहज़ाद अहमद

हाल उस का तिरे चेहरे पे लिखा लगता है

शहज़ाद अहमद

डूब जाएँगे सितारे और बिखर जाएगी रात

शहज़ाद अहमद

दिल का बुरा नहीं मगर शख़्स अजीब ढब का है

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

अब निभानी ही पड़ेगी दोस्ती जैसी भी है

शहज़ाद अहमद

रात को दिन से मिलाने की हवस थी हम को

शहरयार

काग़ज़ की कश्तियाँ भी बहुत काम आएँगी

शहरयार

साए

शहरयार

मुझ को मिलना है 'वहीद-अख़्तर' से

शहरयार

फ़रार

शहरयार

फ़ैसले की घड़ी

शहरयार

एक और साल गिरह

शहरयार

एक और मौत

शहरयार

मा'बद-ए-ज़ीस्त में बुत की मिसाल जड़े होंगे

शहरयार

जुदा हुए वो लोग कि जिन को साथ में आना था

शहरयार

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