दिन Poetry (page 35)

जागते में भी ख़्वाब देखे हैं

सलमान अख़्तर

तआ'क़ुब मेरा ख़ुशबू कर रही थी

सलमा शाहीन

मसअला हुस्न-ए-तख़य्युल का है न इल्हाम का है

सलमा शाहीन

चश्म-ए-नम पहले शफ़क़ बन के सँवरना चाहे

सलमा शाहीन

ज़ब्त की हद से गुज़र कर ख़ार तो होना ही था

सलीम शुजाअ अंसारी

हिज्र के दिन तो हुए ख़त्म बड़ी धूम के साथ

सालिम सलीम

सुकूत-ए-अर्ज़-ओ-समा में ख़ूब इंतिशार देखूँ

सालिम सलीम

न छीन ले कहीं तन्हाई डर सा रहता है

सालिम सलीम

मेरी अर्ज़ानी से मुझ को वो निकालेगा मगर

सालिम सलीम

मिरे ठहराव को कुछ और भी वुसअत दी जाए

सालिम सलीम

कुछ तो ठहरे हुए दरिया में रवानी करें हम

सालिम सलीम

ख़ुद अपनी ख़्वाहिशें ख़ाक-ए-बदन में बोने को

सालिम सलीम

जिस्म की सतह पे तूफ़ान किया जाएगा

सालिम सलीम

हुदूद-ए-शहर-ए-तिलिस्मात से नहीं निकला

सालिम सलीम

इक दरीचे की तमन्ना मुझे दूभर हुई है

सलीम सिद्दीक़ी

बदन क़ुबूल है उर्यानियत का मारा हुआ

सलीम सिद्दीक़ी

मेरे एहसास की रग रग में समाने वाले

सलीम शाहिद

अब्र सरका चाँद की चेहरा-नुमाई हो गई

सलीम शाहिद

वहाँ महफ़िल न सजाई जहाँ ख़ल्वत नहीं की

सलीम कौसर

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं

सलीम कौसर

मिलना न मिलना एक बहाना है और बस

सलीम कौसर

कोई याद ही रख़्त-ए-सफ़र ठहरे कोई राहगुज़र अनजानी हो

सलीम कौसर

डूबने वाले भी तन्हा थे तन्हा देखने वाले थे

सलीम कौसर

चश्म बे-ख़्वाब हुई शहर की वीरानी से

सलीम कौसर

मशवरा

सलीम फ़िगार

आख़िरी पड़ाव

सलीम फ़िगार

शाम ढलते ही तिरे ध्यान में आ जाता हूँ

सलीम फ़िगार

ख़ुशबू सा कोई दिन तो सितारा सी कोई शाम

सलीम फ़िगार

अँधेरे को निगलता जा रहा हूँ

सलीम फ़िगार

फ़स्ल-ए-जुनूँ में दामन-ओ-दिल चाक भी नहीं

सलीम फ़राज़

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