दिन Poetry (page 34)

आँखें दो जुडवाँ बहनें

सारा शगुफ़्ता

रूह में रेंगती रहती है गुनह की ख़्वाहिश

साक़ी फ़ारुक़ी

मिट जाएगा सेहर तुम्हारी आँखों का

साक़ी फ़ारुक़ी

अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है

साक़ी फ़ारुक़ी

मुहासबा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं और मैं!

साक़ी फ़ारुक़ी

हमल-सरा

साक़ी फ़ारुक़ी

एक सुअर से

साक़ी फ़ारुक़ी

वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन

साक़ी फ़ारुक़ी

वो आग हूँ कि नहीं चैन एक आन मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी

उम्र इंकार की दीवार से सर फोड़ती है

साक़ी फ़ारुक़ी

सोच में डूबा हुआ हूँ अक्स अपना देख कर

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं फिर से हो जाऊँगा तन्हा इक दिन

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़्वाब को दिन की शिकस्तों का मुदावा न समझ

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़ाक नींद आए अगर दीदा-ए-बेदार मिले

साक़ी फ़ारुक़ी

एक दिन ज़ेहन में आसेब फिरेगा ऐसा

साक़ी फ़ारुक़ी

दर्द के इताब ले दोस्त उसे शुमार कर

साक़ी फ़ारुक़ी

छुप के मिलने आ जाए रौशनी की जुरअत क्या

साक़ी फ़ारुक़ी

आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो

साक़ी फ़ारुक़ी

में अब तक दिन के हंगामों में गुम था

साक़ी अमरोहवी

तुम्हारी याद को हम ने पलक पर यूँ सजा रक्खा

संजीव आर्या

ख़राब हो गया जब मेरे जिस्म का काग़ज़

संजय मिश्रा शौक़

फिर मैं उन मंज़िलों का तालिब हूँ फिर मैं उस राह से गुज़रता हूँ

संदीप कोल नादिम

आसेब-सिफ़त ये मिरी तन्हाई अजब है

समीना राजा

उतरे तिलिस्म शब के उजालों पे रात-भर

समद अंसारी

तिलिस्म-ए-लफ़्ज़-ओ-मआ'नी को तार तार करें

समद अंसारी

ख़्वाबों के आसरे पे बहुत दिन जिए हो तुम

सलमान अख़्तर

कभी ख़्वाबों में मिला वो तो ख़यालों में कभी

सलमान अख़्तर

जीना अज़ाब क्यूँ है ये क्या हो गया मुझे

सलमान अख़्तर

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