दिन Poetry (page 33)

दरख़्त मेरे दोस्त

सरवत हुसैन

वो मेरे सामने मल्बूस क्या बदलने लगा

सरवत हुसैन

वहीं पर मिरा सीम-तन भी तो है

सरवत हुसैन

उसी किनारा-ए-हैरत-सरा को जाता हूँ

सरवत हुसैन

हवा ओ अब्र को आसूदा-ए-मफ़्हूम कर देखूँ

सरवत हुसैन

हाँ मेरी महबूबा

सरमद सहबाई

फिर ऐसा मोड़ इस क़िस्से में आया

सरफ़राज़ ज़ाहिद

मिल-जुल कर ईमान ख़ुदा पर ला सकते हैं

सरफ़राज़ ज़ाहिद

ख़्वाब में मंज़र रह जाता है

सरफ़राज़ ज़ाहिद

कभी होंटों पे ऐसा लम्स अपनी आँख खोले

सरफ़राज़ ज़ाहिद

ये मैं ने माना कि पहरा है सख़्त रातों का

सरफ़राज़ नवाज़

ज़ीस्त की यकसानियत से तंग आ जाते हैं सब

सरफ़राज़ ख़ालिद

एक दिन उस की निगाहों से भी गिर जाएँगे

सरफ़राज़ ख़ालिद

हर लम्हे मैं सदियों का अफ़्साना होता है

सरफ़राज़ ख़ालिद

शहर भर के आईनों पर ख़ाक डाली जाएगी

सरफ़राज़ दानिश

क़ाबिज़ रहा है दिल पे जो सुल्तान की तरह

सरफ़राज़ शाहिद

टूट के पत्थर गिरते रहते हैं दिन रात चटानों से

सरफ़राज़ आमिर

जिसे तू ने समझा है ज़िंदगी उसी इंक़लाब का नाम है

सरीर काबिरी

तसव्वुरात की दुनिया सजाए बैठे हैं

सरदार सोज़

दिन-ब-दिन सफ़्हा-ए-हस्ती से मिटा जाता हूँ

सरदार सलीम

तुम्हें शब-ए-व'अदा दर्द-ए-सर था ये सब हैं बे-ए'तिबार बातें

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

नाला शब-ए-फ़िराक़ जो कोई निकल गया

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

मैं वो आतिश-ए-नफ़स हूँ आग अभी

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

बोसा देते हो अगर तुम मुझ को दो दो सब के दो

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

आ किधर है तू साक़ी-ए-मख़मूर

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

सरख़ुशी मेरे लिए असबाब-ए-ग़म मेरे लिए

सरस्वती सरन कैफ़

परिंदे की आँख खुल जाती है

सारा शगुफ़्ता

दूसरा पहाड़

सारा शगुफ़्ता

चराग़ जब मेरा कमरा नापता है

सारा शगुफ़्ता

आतिश-दान

सारा शगुफ़्ता

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