दिन Poetry (page 77)
क़ुर्बतें नहीं रक्खीं फ़ासला नहीं रक्खा
भारत भूषण पन्त
किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है
भारत भूषण पन्त
कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे
भारत भूषण पन्त
हर एक रात में अपना हिसाब कर के मुझे
भारत भूषण पन्त
दश्त में उड़ते बगूलों की ये मस्ती एक दिन
भारत भूषण पन्त
आईने से पर्दा कर के देखा जाए
भारत भूषण पन्त
ज़ाहिदों से न बनी हश्र के दिन भी या-रब
बेख़ुद देहलवी
न अरमाँ बन के आते हैं न हसरत बन के आते हैं
बेख़ुद देहलवी
लुत्फ़ से मतलब न कुछ मेरे सताने से ग़रज़
बेख़ुद देहलवी
हर एक बात तिरी बे-सबात कितनी है
बेख़ुद देहलवी
दिल है मुश्ताक़ जुदा आँख तलबगार जुदा
बेख़ुद देहलवी
बेचने आए कोई क्या दिल-ए-शैदा ले कर
बेख़ुद देहलवी
अब किसी बात का तालिब दिल-ए-नाशाद नहीं
बेख़ुद देहलवी
आ गए फिर तिरे अरमान मिटाने हम को
बेख़ुद देहलवी
शिकवा सुन कर जो मिज़ाज-ए-बुत-ए-बद-ख़ू बदला
बेखुद बदायुनी
क्यूँ मैं अब क़ाबिल-ए-जफ़ा न रहा
बेखुद बदायुनी
कभी हया उन्हें आई कभी ग़ुरूर आया
बेखुद बदायुनी
इस बज़्म में न होश रहेगा ज़रा मुझे
बेखुद बदायुनी
न चिलमनों की हसीं सरसराहटें होंगी
बेकल उत्साही
हम चटानों की तरह साहिल पे ढाले जाएँगे
बेकल उत्साही
क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ
बहज़ाद लखनवी
इक बे-वफ़ा को प्यार किया हाए क्या किया
बहज़ाद लखनवी
चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है
बहज़ाद लखनवी
मिरी दास्तान-ए-अलम तो सुन कोई ज़लज़ला नहीं आएगा
बेदिल हैदरी
हम तुम में कल दूरी भी हो सकती है
बेदिल हैदरी
ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है
बेदम शाह वारसी
हम मय-कदे से मर के भी बाहर न जाएँगे
बेदम शाह वारसी
रक़्क़ासा-ए-औहाम
बेबाक भोजपुरी
ग़म-ए-आफ़ाक़ में आरिफ़ अगर करवट बदलता है
बेबाक भोजपुरी
ये मैं कहूँगा फ़लक पे जा कर ज़मीं से आया हूँ तंग आ कर
बयान मेरठी
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