दिन Poetry (page 78)

ये आरज़ू है कि वो नामा-बर से ले काग़ज़

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

फ़रहाद किस उम्मीद पे लाता है जू-ए-शीर

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

ख़त में क्या क्या लिखूँ याद आती है हर बात पे बात

बासिर सुल्तान काज़मी

कर लिया दिन में काम आठ से पाँच

बासिर सुल्तान काज़मी

हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या

बासिर सुल्तान काज़मी

शाम भी है सुब्ह भी है और दिन भी रात भी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

जब मिलेंगे कि अब मिलेंगे आप

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

गूँजूँगा तेरे ज़ेहन के गुम्बद में रात-दिन

बशीर सैफ़ी

इक हुस्न-ए-बे-मिसाल के जो रू-ब-रू हूँ मैं

बशीर सैफ़ी

ऐसा लगता है मुख़ालिफ़ है ख़ुदाई मेरी

बशीर सैफ़ी

रुख़ तुम्हारा हो जिधर हम भी उधर हो जाएँगे

बशीर महताब

लोगो हम छान चुके जा के समुंदर सारे

बशीर फ़ारूक़ी

रात का इंतिज़ार कौन करे

बशीर बद्र

मैं ने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ माँगी थी

बशीर बद्र

मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ

बशीर बद्र

कोई बादल हो तो थम जाए मगर अश्क मिरे

बशीर बद्र

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं

बशीर बद्र

जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है

बशीर बद्र

बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे

बशीर बद्र

अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ

बशीर बद्र

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं

बशीर बद्र

शाम आँखों में आँख पानी में

बशीर बद्र

रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना

बशीर बद्र

प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी

बशीर बद्र

फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे

बशीर बद्र

न जी भर के देखा न कुछ बात की

बशीर बद्र

मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई

बशीर बद्र

मेरी आँखों में तिरे प्यार का आँसू आए

बशीर बद्र

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