दिन Poetry (page 79)

ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में

बशीर बद्र

कौन आया रास्ते आईना-ख़ाने हो गए

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है

बशीर बद्र

अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे

बशीर बद्र

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

बशीर बद्र

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ

बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

बशीर बद्र

ज़ख़्म खा के ख़ंदाँ हैं पैरहन-दरीदा हम

बशीर मुंज़िर

सोए हुए जज़्बों को जगा कर फिर वो शाम न आई

बशीर मुंज़िर

क्या बिछड़ कर रह गया जाने भरी बरसात में

बशीर मुंज़िर

हर रोज़ ही दिन भर के झमेलों से निमट के

बशीर मुंज़िर

अच्छे कभी बुरे हैं हालात आदमी के

बशीर मुंज़िर

क़र्या क़र्या ख़ाक उड़ाई कूचा-गर्द फ़क़ीर हुए

बशीर अहमद बशीर

रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे

बशर नवाज़

जब कभी होंगे तो हम माइल-ए-ग़म ही होंगे

बशर नवाज़

अगर हयात है देखेंगे एक दिन दीदार

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वो शाह-ए-हुस्न जो बे-मिस्ल है हसीनों में

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

लाख पर्दे से रुख़-ए-अनवर अयाँ हो जाएगा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

उन का या अपना तमाशा देखो

बाक़ी सिद्दीक़ी

उदास बाम है दर काटने को आता है

बाक़ी अहमदपुरी

कल के दिन जो गिर्द मय-ख़ाने के फिरते थे ख़राब

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

इश्क़ ने मंसब लिखे जिस दिन मिरी तक़दीर में

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

रह-रवाँ कहते हैं जिस को जरस-ए-महमिल है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जो जहाँ के आइना हैं दिल उन्हों के सादा हैं

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

टूटे शीशे की आख़िरी नज़्म

बाक़र मेहदी

रेत और दर्द

बाक़र मेहदी

मेरा जनम दिन

बाक़र मेहदी

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