दिन Poetry (page 81)

मेरी हर बात पे बे-बात ख़फ़ा होते हो

बीएस जैन जौहर

घर में रहते हुए डर लगता है

बीएस जैन जौहर

घर में रहते हुए डर लगता है

बीएस जैन जौहर

तारीक उजालों में बे-ख़्वाब नहीं रहना

अज़रा वहीद

उन्हें मुझ से शिकायत है

अज़रा नक़वी

ख़्वाब-जंगल

अज़रा नक़वी

हार-सिंगार

अज़रा नक़वी

टूटी हुई रस्सी

अज़रा अब्बास

सब दिन एक जैसे नहीं होते

अज़रा अब्बास

मेल उतारना मुश्किल लगता है

अज़रा अब्बास

दिन

अज़रा अब्बास

आवाज़ गिरती है

अज़रा अब्बास

आख़िरी रूसूमात के दौरान

अज़रा अब्बास

तीरगी में सुब्ह की तनवीर बन जाएँगे हम

अज़्म शाकरी

ख़ाक उड़ाते हुए ये म'अरका सर करना है

अज़्म शाकरी

मैं ने कल ख़्वाब में आइंदा को चलते देखा

अज़्म बहज़ाद

मैं उम्र के रस्ते में चुप-चाप बिखर जाता

अज़्म बहज़ाद

उफ़ुक़ के उस पार कर रहा है कोई मिरा इंतिज़ार शायद

अज़ीज़ तमन्नाई

नाला-ए-बे-आसमाँ

अज़ीज़ क़ैसी

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है

अज़ीज़ क़ैसी

दिल-ख़स्तगाँ में दर्द का आज़र कोई तो आए

अज़ीज़ क़ैसी

सुनो मुसाफ़िर! सराए-जाँ को तुम्हारी यादें जला चुकी हैं

अज़ीज़ नबील

हाए क्या चीज़ थी जवानी भी

अज़ीज़ लखनवी

लज़्ज़त-ए-ग़म

अज़ीज़ लखनवी

बचपने की याद

अज़ीज़ लखनवी

इश्क़ जो मेराज का इक ज़ीना है

अज़ीज़ लखनवी

हिज्र की रात याद आती है

अज़ीज़ लखनवी

ग़लत है दिल पे क़ब्ज़ा क्या करेगी बे-ख़ुदी मेरी

अज़ीज़ लखनवी

भड़क उट्ठेंगे शो'ले एक दिन दुनिया की महफ़िल में

अज़ीज़ लखनवी

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