दिन Poetry (page 80)

गोडो

बाक़र मेहदी

दीमक

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

एक उलझन रात दिन पलती रही दिल में कि हम

बक़ा बलूच

माँ

बक़ा बलूच

उम्र भर कुछ ख़्वाब दिल पर दस्तकें देते रहे

बक़ा बलूच

कम कम रहना ग़म के सुर्ख़ जज़ीरों में

बक़ा बलूच

रात दिन इक बेबसी ज़िंदा रही

बलवान सिंह आज़र

ये ज़र्द बच्चे

बलराज कोमल

तहलील

बलराज कोमल

शायद

बलराज कोमल

एक पुर-असरार सदा

बलराज कोमल

कौन कहता है ठहर जाना है

बकुल देव

हमें देखा न कर उड़ती नज़र से

बकुल देव

नहीं दुनिया में आज़ादी किसी को

बहराम जी

किया है संदलीं-रंगों ने दर बंद

बहराम जी

मेरे सुर्ख़ लहू से चमकी कितने हाथों में मेहंदी

ज़फ़र

हो गया जिस दिन से अपने दिल पर उस को इख़्तियार

ज़फ़र

याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है

ज़फ़र

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ

ज़फ़र

होते होते चश्म से आज अश्क-बारी रह गई

ज़फ़र

ज़रूरतों की हमाहमी में जो राह चलते भी टोकती है वो शाइ'री है

बद्र-ए-आलम ख़लिश

इक़रार किसी दिन है तो इंकार किसी दिन

बद्र वास्ती

चराग़ों में अँधेरा है अँधेरे में उजाले हैं

बद्र वास्ती

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

मेरी हर बात पे बे-बात ख़फ़ा होते हो

बीएस जैन जौहर

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