दिन Poetry (page 83)

शब भर आँख में भीगा था

अज़हर अदीब

मैं उस का नाम ले बैठा था इक दिन

अज़हर अदीब

क़ज़ा का तीर था कोई कमान से निकल गया

अज़हर अदीब

क्या तेरा क्या मेरा ख़्वाब

अज़हर अदीब

इधर महसूस होती है कमी उस की

अज़हर अब्बास

ये और बात है कि मदावा-ए-ग़म न था

अज़ीम मुर्तज़ा

वो रूह के गुम्बद में सदा बन के मिलेगा

आज़ाद गुलाटी

लम्हा लम्हा इक नई सई-ए-बक़ा करती हुई

आज़ाद गुलाटी

डूब कर ख़ुद में कभी यूँ बे-कराँ हो जाऊँगा

आज़ाद गुलाटी

दिन में इस तरह मिरे दिल में समाया सूरज

आज़ाद गुलाटी

मोहब्बत का एक साल

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

उस निगाह-ए-नाज़ ने यूँ रात-भर तज्सीम की

औरंगज़ेब

कैसा मंज़र गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

आइना है ख़याल की हैरत

औरंगज़ेब

चार-सू आलम-ए-इम्काँ में अँधेरा देखा

औज लखनवी

निगाह कोई तो तूफ़ाँ में मेहरबान सी है

अतुल अजनबी

वो जो सर्फ़-ए-निगाह करता है

अतीक़ुल्लाह

तू भी तो एक लफ़्ज़ है इक दिन मिरे बयाँ में आ

अतीक़ुल्लाह

कुछ और दिन अभी उस जा क़याम करना था

अतीक़ुल्लाह

कुछ और दिन अभी इस जा क़याम करना था

अतीक़ुल्लाह

फ़रार के लिए जब रास्ता नहीं होगा

अतीक़ुल्लाह

दिल के नज़दीक तो साया भी नहीं है कोई

अतीक़ुल्लाह

दे कर पिछली यादों का अम्बार मुझे

अतीक़ुल्लाह

चराग़ हाथों के बुझ रहे हैं सितारा हर रह-गुज़र में रख दे

अतीक़ुल्लाह

बहुत दिन से तुम्हें देखा नहीं था

अतीक़ुल्लाह

वो बात जिस से ये डर था खुली तो जाँ लेगी

आतिफ़ ख़ान

मुसव्विर का हाथ

अतहर राज़

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